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शुक्रवार, 12 जून 2026

मंत्र कीलक का अर्थ

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1. "कीलक" का अर्थ

"कीलक" (कील या ताला) शब्द तंत्र और मंत्रशास्त्र में मिलता है। इसका आशय किसी मंत्र या स्तोत्र की शक्ति पर लगे प्रतीकात्मक बंधन से लिया जाता है, जिसे उचित साधना, दीक्षा और गुरु के मार्गदर्शन से खोला जाता है।

सबसे प्रसिद्ध उदाहरण दुर्गा सप्तशती का कीलक स्तोत्र है, जहाँ "कीलक" का उल्लेख स्पष्ट रूप से मिलता है।

2. क्या "कामाख्या कीलक" नाम से कोई प्रमाणित ग्रंथ है?

वर्तमान में उपलब्ध प्रमुख तांत्रिक ग्रंथों—जैसे कालिका पुराण, योगिनी तंत्र और कुलार्णव तंत्र—में "कामाख्या कीलक" शीर्षक से कोई सर्वमान्य और प्रसिद्ध स्वतंत्र अध्याय या मंत्र व्यापक रूप से प्रमाणित नहीं है।

इसलिए यह कहना कि "कामाख्या का वास्तविक कीलक किसी गुप्त श्लोक में नहीं, बल्कि समर्पण और गुरु-प्रदत्त साधना में निहित है" अधिकतर आध्यात्मिक और परंपरागत व्याख्या है, न कि किसी एक शास्त्र का प्रत्यक्ष उद्धरण।

3. कामाख्या का महत्व

कामाख्या मंदिर को 51 या 52 शक्तिपीठों में अत्यंत प्रमुख माना जाता है। शाक्त और तांत्रिक परंपरा में इसे देवी की योनि-शक्ति का प्रतीक माना जाता है, जो सृष्टि की मूल ऊर्जा का द्योतक है।

4. प्रणाम मंत्र

आपके द्वारा उद्धृत मंत्र—

कामाख्ये वरदे देवि नीलपर्वतवासिनि।
त्वं देवि जगतां मातः योनिमुद्रे नमोऽस्तु ते॥

यह मंत्र कामाख्या देवी की स्तुति में प्रचलित है और अनेक साधक इसका जप करते हैं।

5. क्या कीलक-भेदन केवल आंतरिक प्रक्रिया है?

तांत्रिक परंपराओं में दो प्रकार की व्याख्याएँ मिलती हैं—

  • बाह्य (अनुष्ठानिक) – गुरु से दीक्षा, न्यास, मंत्र-जप, यंत्र, होम आदि।

  • आंतरिक (आध्यात्मिक) – अहंकार, भय, संशय और आसक्ति का क्षय तथा पूर्ण समर्पण।

कई तांत्रिक आचार्य मानते हैं कि वास्तविक सिद्धि इन दोनों के समन्वय से प्राप्त होती है।


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मंगलवार, 9 जून 2026

कामसूत्र, कोकशास्त्र और चौरासी आसन: प्राचीन भारत के वो गुप्त रहस्य जो आज भी आपको हैरान

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 कामसूत्र, कोकशास्त्र और चौरासी आसन: प्राचीन

भारत के वो गुप्त रहस्य जो आज भी आपको हैरान

कर देंगे!


क्या आप भी 'पद्मिनी' और 'चित्रिणी' जैसी सम्मोहक स्त्रियों को कामसूत्र का हिस्सा मानते हैं? क्या आपको लगता है कि कामसूत्र सिर्फ बेडरूम के आसनों की एक किताब है? अगर हाँ, तो आप एक बहुत बड़े भ्रम में जी रहे हैं।


​आज हम इतिहास के पन्नों को पलटकर प्राचीन भारत के उस गुप्त विज्ञान की परतें खोलेंगे, जहाँ अध्यात्म, मनोविज्ञान, शरीर विज्ञान और कामुक ऊर्जा का एक अद्भुत मिलन होता है। आइए जानते हैं उस कड़वे और मादक सच को, जिसे लोग अक्सर अनजाने में घालमेल कर देते हैं।


​पाठकों के बीच सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि वे कामशास्त्र से जुड़ी हर बात को 'कामसूत्र' मान लेते हैं। लेकिन सच यह है कि ये दोनों अलग-अलग युगों में लिखे गए दो बेहद अलग ग्रंथ हैं:

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​महर्षि वात्स्यायन का 'कामसूत्र' (समय: लगभग तीसरी सदी ईसा पूर्व से दूसरी सदी ईस्वी)

​आज से लगभग 1800-2000 साल पहले महर्षि वात्स्यायन ने 'कामसूत्र' की रचना की थी। यह केवल सेक्स गाइड नहीं है, बल्कि सुखी नागरिक जीवन, स्त्री-पुरुष मनोविज्ञान और कलाओं का एक दार्शनिक ग्रंथ है। वात्स्यायन ने इसमें स्त्रियों को किसी 'पद्मिनी' या 'शंखिनी' में नहीं बांटा, बल्कि उनके आंतरिक काम-वेग और शारीरिक अनुकूलता के आधार पर तीन बेहद व्यावहारिक भेद किए:—

​मृगी: अत्यंत कोमल शरीर और शांत काम-वेग वाली स्त्री।

​बड़वा: मध्यम वेग और सामान्य शरीर वाली संतुलित स्त्री।

​हस्तिनी: अत्यधिक तीव्र काम-वेग और सुदृढ़ शरीर वाली ऊर्जावान स्त्री।


​कामसूत्र के सैकड़ों साल बाद, ( लगभग 11बीं़-12बीं सदी) मध्यकाल में कवि कोकोक ने 'रतिरहस्य' नाम का ग्रंथ लिखा, जिसे उनके नाम पर 'कोकशास्त्र' कहा गया। कोकोक ने वात्स्यायन के सूत्रों को और अधिक सरल, व्यावहारिक और थोड़ा और मादक बनाया। जो ४ भेद आज दुनिया भर में सबसे ज़्यादा चाव से पढ़े जाते हैं, वे इसी कोकशास्त्र की देन हैं:


​पद्मिनी: जिसके शरीर से कमल की प्राकृतिक खुशबू आती है, जो सात्विक और सर्वश्रेष्ठ है।

​चित्रिणी: जो दुबली-पतली, चंचल और संगीत-नृत्य जैसी कलाओं की दीवानी होती है।

​शंखिनी: जो बोल्ड, लंबी, तीखे स्वभाव वाली और अपनी इच्छाओं को खुलकर बोलने वाली होती है।

​हस्तिनी: जो भारी शरीर, मोटे होंठ और समंदर जैसे गहरे काम-वेग वाली होती है।


​क्या है कामसूत्र के 84 आसनों का रहस्य? ​जब भी कामसूत्र का नाम आता है, लोगों के मन में तरह-तरह के आसनों की तस्वीरें तैरने लगती हैं। लेकिन यहाँ भी एक बहुत बड़ा कौतूहल है।

​मूल कामसूत्र में वात्स्यायन ने मुख्य रूप से 64 कलाओं और संभोग की कुछ मूलभूत स्थितियों का वर्णन किया था। लेकिन समय के साथ, जब इस विज्ञान का विकास हुआ और इसमें योगशास्त्र तथा तंत्र विज्ञान का समावेश हुआ, तब चौरासी (84) आसनों की अवधारणा सामने आई।


ये 84 आसन केवल शारीरिक कसरत या वासना की तृप्ति के साधन नहीं हैं। प्राचीन आचार्यों के अनुसार, मानव शरीर में चौरासी लाख योनियों के प्रतीक स्वरूप कुछ मुख्य ऊर्जा केंद्र होते हैं। इन 84 आसनों का उद्देश्य स्त्री और पुरुष के शरीर की रीढ़ की हड्डी में छिपी कुंडलिनी ऊर्जा और काम-ऊर्जा  को जगाकर उसे 'उर्ध्वरेता' यानी ऊपर की ओर उठाना है। सरल शब्दों में कहें तो, ये आसन दो शरीरों के मिलन को एक ऐसी साधना बना देते हैं जहाँ चरम सुख (Orgasm) केवल शारीरिक न रहकर आत्मिक आनंद (Spiritual Ecstasy) में बदल जाता है।


आजकल ज्यादातर लोग ‘चौरासी आसन’ को सुनते ही इसे केवल कामुकता या कामसूत्र से जोड़कर देखते हैं। लेकिन इसका असली सच जानकर आप हैरान रह जाएंगे।

मूल कामसूत्र में 84 आसनों का कहीं कोई उल्लेख नहीं है। वात्स्यायन के कामसूत्र में यौन-मुद्राओं और कामकला का वर्णन है, पर “चौरासी आसन” जैसी कोई अवधारणा नहीं मिलती। वास्तव में, 84 आसनों की परंपरा हठयोग और नाथ संप्रदाय से आई है। यह मुख्य रूप से दो महत्वपूर्ण ग्रंथों में मिलती है:

गोरक्ष शतक — योगिराज बाबा गोरखनाथ द्वारा रचित

हठयोग प्रदीपिका — स्वामी स्वात्माराम द्वारा लिखित (15वीं शताब्दी)

इन ग्रंथों में कहा गया है कि84 प्रमुख आसन हैं, जिनमें से कुछ विशेष आसन (जैसे सिद्धासन, पद्मासन, सिंहासन और भद्रासन) अत्यंत महत्वपूर्ण माने गए हैं।


प्राचीन योगाचार्यों ने काम-ऊर्जा (रेतस या Sexual Energy) को मात्र नष्ट करने या दबाने की बात नहीं की। उन्होंने इसे रूपांतरित (Transmutation) करने का मार्ग बताया।

इन 84 आसनों, विभिन्न मुद्राओं, बंधों और प्राणायाम के माध्यम से इस ऊर्जा को जागृत कर कुंडलिनी के रूप में शरीर के विभिन्न चक्रों से गुजारकर सहस्रार चक्र तक ले जाना ही हठयोग का मूल उद्देश्य है। इसका अंतिम लक्ष्य है — ऊर्ध्वरेतस की अवस्था, ओजस का निर्माण, और परम आनंद व समाधि की प्राप्ति। 84 आसन कामुकता का साधन नहीं, बल्कि काम-ऊर्जा को आध्यात्मिक


ऊर्जा में बदलने का वैज्ञानिक और साधना-पूर्ण माध्यम हैं।


​जब कामशास्त्र की स्त्रियाँ साहित्य की 'नायिका' बनती हैं...​अब बात करते हैं उस सुंदर और कलात्मक पहलू की, जो हमें प्राचीन महलों और हिंदी साहित्य के रीतिकाल के चित्रों में देखने को मिलता है। जब कोकशास्त्र की ये कामुक स्त्रियाँ (जैसे चित्रिणी या पद्मिनी) प्रेम और विरह के अलग-अलग दौर से गुजरती हैं, तो हमारा साहित्य (काव्यशास्त्र) इन्हें 'अष्ट-नायिका' (8 मुख्य अवस्थाओं) के रूप में पूजने लगता है:


​अभिसारिका: जब वही कलाप्रेमी और चंचल 'चित्रिणी' लोक-लाज और समाज की परवाह किए बिना, रात के अंधेरे में तड़पती हुई अपने प्रेमी से मिलने भागती है।


​वासकसज्जा: जब वही कोमल 'पद्मिनी' अपने बेडरूम को फूलों से सजाकर, इध-उधर इत्र छिड़ककर, कामदेव की प्रतीक्षा में आँखें बिछाए बैठी होती है।


​खण्डिता: जब नायक रात भर किसी दूसरी स्त्री के पास रहकर सुबह घर लौटता है, और नायिका की आँखों में प्रेम की जगह लाल-लाल क्रोध और ईर्ष्या की ज्वाला भड़क उठती है।


​प्रोषितपतिका: जिसका पति या प्रेमी कमाने के लिए परदेस चला गया हो और वह उसकी याद में सूनी आँखों से विरह की आग में जल रही हो।


​साहित्य में स्वभाव के आधार पर इन्हें 'मुग्धा' (भोली-भाली नवयौवना), 'म्या' (मर्यादित और समझदार) और 'प्रौढ़ा' (चतुर और बेडरूम की कलाओं में पूरी तरह अनुभवी) भी कहा गया है। 


​प्राचीन भारत का यह विज्ञान हमें सिखाता है कि काम (Sexuality) कोई पाप या छुपाने वाली अश्लील चीज़ नहीं है, बल्कि यह जीवन का एक अनिवार्य और पवित्र हिस्सा है। जहाँ कामसूत्र हमें मन का मनोविज्ञान सिखाता है, कोकशास्त्र हमें शरीर की श्रेणियाँ बताता है, 84 आसन हमें ऊर्जा का संतुलन सिखाते हैं, वहीं साहित्य (नायिका-भेद) हमें उस प्रेम की भावनाओं की सुंदरता से रूबरू कराता है। यानी वासना से उपासना तक का सफर करा देता है। ​यह पूरा सफर शरीर की वासना से शुरू होकर आत्मा की उपासना पर जाकर खत्म होता है। अब आप खुद को और अपने पार्टनर को टटोलिए—आप किस श्रेणी के प्रेमी हैं और आपकी कामुक ऊर्जा किस स्तर पर है? साभार Facebook 

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सोमवार, 18 मई 2026

कामदेवकला

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 **#कामदेवकला


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**ॐ कामद'काम' का शास्त्रीय अर्थ: वासना नहीं, सृजन-शक्ति

'काम' का अर्थ केवल शारीरिक वासना नहीं है। वेद कहते हैं – *"कामस्तदग्रे समवर्तताधि"* – सृष्टि के आरम्भ में सबसे पहले 'काम' उत्पन्न हुआ। यह वह दिव्य संकल्प है जिससे ब्रह्म ने "एकोऽहं बहुस्याम्" सोचा – मैं एक हूँ, अनेक हो जाऊँ।


इसलिए **कामदेवकला** वे देवी हैं जो सृजन, सौन्दर्य, आकर्षण, प्रेम, कला, रस की 64 कलाओं के रूप में स्थित हैं। कामदेव पुरुष-तत्त्व हैं – इच्छा। कामदेवकला स्त्री-तत्त्व हैं – इच्छा को रूप देने वाली कला। बिना कला के काम पशु-वृत्ति है, कला के साथ काम 'शृंगार-रस' बन जाता है।


### 2. कामदेव की 5 पुष्प-बाण और 64 कलाएँ

कामदेव के 5 बाण प्रसिद्ध हैं – अरविन्द, अशोक, चूत, नवमल्लिका, नीलोत्पल। ये 5 इन्द्रियों को मोहित करते हैं। पर इन बाणों को चलाने की 'कला' कामदेवकला देती हैं।


**कामसूत्र** और **ललित-कला ग्रन्थों** में 64 कलाएँ गिनाई गई हैं। ये केवल शृंगार नहीं, जीवन को सुन्दर बनाने की विद्या हैं:


**कुछ प्रमुख कलाएँ**: गीत, वाद्य, नृत्य, आलेख्य, विशेषक-च्छेद्य, तण्डुल-कुसुम-बलि-विकार, पुष्पास्तरण, दशन-वसन-अंगराग, मणि-भूमिका-कर्म, शयन-रचना, उदक-वाद्य, चित्र-योग, माल्य-ग्रथन, केश-शेखर-योजन, नेपथ्य-प्रयोग... आदि।


सार: खाना बनाना कला है, घर सजाना कला है, बोलना कला है, प्रेम करना कला है। जहाँ 'सौन्दर्य-बोध' है, वहाँ कामदेवकला हैं।


### 3. शास्त्रों में कामदेवकला स्वरूप


**ललिता सहस्रनाम**: *"कामेश्वरी कामकला कामदेव-निषेविता"* – देवी ललिता स्वयं 'कामकला' हैं। श्रीचक्र के मध्य-बिन्दु को 'कामकला' कहते हैं – शिव-शक्ति का सम्मिलन-बिन्दु, जहाँ से सृष्टि का स्पन्दन शुरू होता है।


**सौन्दर्य लहरी श्लोक 19**: *"मुखं बिन्दुं कृत्वा कुचयुगमधस्तस्य तदधो..."* – आदि शंकराचार्य कामकला-यन्त्र का वर्णन करते हैं। यह ब्रह्माण्ड की रचना का ज्यामितीय रूप है।


**तन्त्र**: 10 महाविद्याओं में 'कमला' और 'त्रिपुरसुन्दरी' कामदेवकला की अधिष्ठात्री हैं। 'कामेश्वरी' नाम से इनकी उपासना होती है। कृष्ण की रासलीला में गोपियाँ कामदेवकला का ही मूर्त रूप हैं – प्रेम को भक्ति बना दिया।


**दुर्गा सप्तशती**: *"या देवी सर्वभूतेषु कामरूपेण संस्थिता"* – जो देवी सब प्राणियों में काम-रूप से स्थित हैं। बीज में वृक्ष बनने की कामना, नदी में सागर से मिलने की कामना, जीव में शिव से मिलने की कामना – सब कामदेवकला हैं।


### 4. कामदेवकला के 4 आयुध: सृजन के उपकरण

देवी को चतुर्भुजा दिखाते हैं:


| आयुध | प्रतीक | कला का पक्ष |

| --- | --- | --- |

| **1. इक्षु-धनुष** | ईख का धनुष – मन | मन को साधो तो प्रेम मधुर, न साधो तो चुभता है |

| **2. पुष्प-बाण** | 5 फूलों के बाण | 5 इन्द्रियाँ – रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द से सम्मोहन |

| **3. पाश** | प्रेम-रज्जु | आकर्षण, बाँधने वाली अनुराग-शक्ति |

| **4. अंकुश** | अंकुश | मर्यादा, निग्रह। काम उच्छृंखल न हो जाए |


**रहस्य**: कामदेव के बाण फूल के हैं, लोहे के नहीं। अर्थात् प्रेम चोट नहीं करता, जोड़ता है। पर अंकुश बताता है – प्रेम में भी 'मर्यादा' हो। वही कामदेवकला है।


### 5. कामदेवकला मंत्र: सौन्दर्य और सृजन की साधना

**मूल मंत्र**: ॐ कामदेवकलायै नमः – 12 अक्षर। 12 राशियाँ, 12 महीने – सम्पूर्ण वर्ष सौन्दर्यमय हो।


**विनियोग**: ॐ अस्य श्री कामदेवकला महामन्त्रस्य, कामदेव ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द:, श्री कामदेवकला देवता, सौन्दर्य-सृजन-प्रेम-प्राप्त्यर्थे जपे विनियोग:।


**सात्त्विक प्रयोग**:

1. **समय**: शुक्रवार, वसन्त-पंचमी, पूर्णिमा। सूर्योदय या प्रदोष काल।

2. **स्थान**: स्वच्छ, सुगन्धित। गुलाब, मोगरा का फूल। गुलाबी वस्त्र।

3. **जाप**: 108 बार। भाव: हृदय-चक्र से गुलाबी-स्वर्ण प्रकाश निकलकर पूरे शरीर को सुन्दर, सृजनशील बना रहा है।

4. **अनुष्ठान**: 16 दिन – षोडशी कला के लिए। कलाकार, कवि, डिजाइनर, दम्पति, निस्संतान के लिए विशेष।


**लाभ**: व्यक्तित्व में आकर्षण, वैवाहिक जीवन में मधुरता, कला-कौशल में निखार, सन्तान-प्राप्ति, नीरसता का नाश, सौन्दर्य-बोध जागता है।


**कड़ी सावधानी**: यह मंत्र 'वशीकरण' के लिए नहीं है। कामदेवकला 'प्रेम' देती हैं, 'वासना' नहीं। पर-स्त्री/पुरुष के लिए प्रयोग महापाप है। देवी कुपित होकर सौन्दर्य, बुद्धि, यश तीनों हर लेती हैं।


### 6. कामदेवकला का आधुनिक सन्देश: प्रेम को कला बनाओ

आज 'काम' है, 'कला' नहीं। परिणाम – रिश्ते टूट रहे हैं, तलाक बढ़ रहे हैं, डिप्रेशन बढ़ रहा है।


**कामदेवकला 3 सूत्र देती हैं**:

1. **देह से देव तक**: केवल देह का आकर्षण 6 महीने चलता है। मन का आकर्षण 6 साल। आत्मा का आकर्षण 6 जन्म। काम को 'रति' से 'प्रीति' तक, प्रीति से 'भक्ति' तक ले जाओ।

2. **उपभोग नहीं, उपयोग**: फूल को तोड़ो मत, पौधे को सींचो। पत्नी को 'ऑब्जेक्ट' नहीं, 'देवी' मानो। पति को 'एटीएम' नहीं, 'राम' मानो। यही कामदेवकला है।

3. **सृजन करो**: प्रेम का अन्तिम फल 'सन्तान' या 'कला' है। जिस प्रेम से कुछ सुन्दर न जन्मे, वह काम नहीं, वासना है।


**सोशल-मीडिया युग में**: फिल्टर से चेहरा सुन्दर नहीं होता, संस्कार से होता है। 64 कला सीखो – खाना बनाना, कविता लिखना, घर सजाना, मधुर बोलना। ये 'रियल फिल्टर' हैं।


### 7. कामदेवकला स्तुति

```

कामेश्वरी कामकला कामरूपा मनोहरा।  

शृंगाररससम्पूर्णा कामदेवकलां भजे॥


इक्षुकोदण्डसम्पन्ना पुष्पबाणलसत्करा।  

पाशांकुशधरा वन्दे कामदेवकलां पराम्॥

```

*जो कामेश्वरी, कामकला-स्वरूपा, मन को हरने वाली, शृंगार-रस से पूर्ण हैं, उन कामदेवकला को भजता हूँ।*


**उपसंहार: जीवन को उत्सव बनाओ**  

कामदेवकला हमें सिखाती हैं कि जीवन 'युद्ध' नहीं, 'रास' है। कृष्ण ने युद्ध भी किया, रास भी रचाया। दोनों में कुशल वही है जो 'कला' जानता है।


जिस दिन तुम फूल देखकर मुस्कुरा दो, बारिश में भीग जाओ, पत्नी के बाल सँवार दो, माँ के पैर दबा दो, बच्चे के साथ बच्चे बन जाओ – समझ लेना कामदेवकला तुममें उतर आईं।


**ॐ कामदेवकलायै नमः।**  

हे सौन्दर्य की देवी! हमें वासना नहीं, उपासना दो। हमारे प्रेम को हवस नहीं, उत्सव बना दो। हमारे जीवन को 64 कलाओं से सजा दो..!!

साभार  स्वर्णवंशी_राइटर_एडिटर Facebook 

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शनिवार, 16 मई 2026

आत्मा के रहस्य

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एक दो लेख पारे पर ले लेते हैं | उसके बाद पुनः साधक विषय पर आएंगे | ये साधक विषय जरूरी है जो आपको जिम्मेदारी का बोध कराएगा | अभी पारे पर बात करते हैं | पिछले साल जो लेख छोड़ा था उसी को आगे बढ़ाएंगे | लेकिन पहले एक प्रश्न को समझते हैं | जो कई बार पूछा गया है | यदि किसी धातु के केंद्र में परिवर्तन नहीं होगा तो वाह्य परिवर्तन कैसे संभव है ? वैसे तो इस प्रश्न का जवाब मैंने कई बार लिखा है | लेकिन आप लेखों की ध्यान से पढ़ते नहीं हैं | बड़े स्तर के डाक्टर और इंजीनियर भी 10 साल बाद कहते हैं अब बात समझ आई है | तो आप ठीक से समझकर पढ़ा करें | लेकिन चलिए प्रश्न आया है तो इसे एक नए आयाम से समझते हैं | ये सही है यदि किसी धातु या मनुष्य के केंद्र में परिवर्तन नहीं होगा तो वो वास्तविक परिवर्तन नहीं होगा | लेकिन ये पूरा सत्य नहीं है | जी हाँ ये पूरा सत्य नहीं है | लेकिन रस विद्या इसी एक सत्य पर टिकी है कि केंद्र में परिवर्तन करके ही मनुष्य या धातु में परिवर्तन किया जा सकता है | ये भी सत्य है |  

क्योंकि रस विद्या के वैज्ञानिकों ने हजार साल पहले लोह वेध या धातु वेध और देह वेध का पारा बनाया | इसे मनुष्य और धातु के केंद्र तक पहुंचाया गया | और जैविक चेतना में समूल परिवर्तन किया गया | लोग अजर अमर हो गए | पारे के अंदर स्वर्ण बीज और अभ्रक सत्व को जारित किया गया | इसके बाद इसे मनुष्य के केंद्र तक भेजा गया, जिससे मनुष्य अजर अमर हो गया | दूसरा धातु के केंद्र तक भेजा गया इससे ताम्र, चांदी और सीसे का स्वर्ण में परिवर्तन हुआ | ये सब प्रमाणिक सत्य है | जो आपको रस ग्रंथों में मिल जाएगा | रसविदों ने ये भी बताया किसी भी धातु का बीज बनाएं; उसे अन्य धातुओं के केंद्र में रोपित करके अन्य धातुओं में बदला जा सकता है | ये कोई जादू नहीं है बल्कि विशुद्ध विज्ञान है | क्योंकि रस सिद्धों की लंबी सूची रस ग्रंथों में मिल जाती है | एक समय तक तो जैसे अन्य शैव, शाक्त, वैष्णव पंथ हैं वैसे है रस विद्या भी एक मार्ग थी ब्रह्म प्राप्ति के लिए | रस याने पारा | पारे से जगत और ब्रह्म दोनों की सिद्धि मिलती है | 

लेकिन समय साथ-साथ ये विज्ञान विलुप्त तो नहीं हुआ लेकिन सीमित जरूर हो गया | कारण ये विज्ञान उस मार्ग के लोगों के लिए था जो उस मार्ग रस विद्या का अनुसरण करते हैं | इसको लेकर अवधारणा बिल्कुल साफ थी | एक तो जन्म जन्मांतर के चक्कर से बचना | दूसरा जब तक मुक्ति सुनिश्चित न हो जाए इसी मनुष्य शरीर में रहा जाए | तीसरा जीवन को आनंद मय बनाकर जिया जाए | अब जो आयुर्वेद के साथ हुआ है उनके उपयोगी जूस आदि तो पाँच सितारा वाले चोरी कर ले गए | अब आयुर्वेद छूँछा गन्ना रह गया है | जिसकी आधे से ज्यादा निर्भरता सिर्फ पारे से बनी औषधियों पर रह गई है | और अगर पारा बंद हो गया तो आयुर्वेद कंगाल हो जाएगा | बस यही रस विद्या के साथ हुआ | कुछ तो सोना चांदी बनाने वाले चोरी कर लाए | अन्य कुछ 100 औरतें खड़ी रहे ...........| एक रस सिंदूर ही सम्हाल लेगा | ये अलग बात है इसमें कितने सफल हैं ? लेकिन कोशिश होती रहती है | अब आयुर्वेद में तय मानकों के आधार पर ही सब कुछ हो रहा है | रोगी से इसका बहुत वास्ता नहीं होता है |

वर्तमान समय में जो लोग भी कीमिया कर रहे हैं | उन्हें केंद्र से कुछ मतलब होता नहीं है | पारे की भस्म ताम्र में डालेंगे सोना बना जाएगा | हो किसी का नहीं रहा है | कारण समझकर कोई काम करता ही नहीं है | अपने प्रश्न पर आते है “केंद्र में परिवर्तन करना” | सबसे पहले आपको केंद्र locate करना होगा | ये आप कैसे करेंगे ? ये किसी को पता नहीं है | मेरे लेख यदि आपने समझदारी से पढ़े होते तो जवाब वहाँ मिल जाता | क्योंकि रस विद्या की जड़ तो यही है केंद्र में परिवर्तन करना है | तभी परिवर्तन संभव है | तो जो लोग भी कीमिया करते हैं उन्हें केंद्र सबसे पहले मालूम होना चाहिए क्या ? कैसे और कहाँ ?? 

पहले हम इस केंद्र को ही समझते हैं | जो हजार साल पहले शोध हुआ उन्हीं के तरीके से समझते हैं | और वर्तमान के तरीके से भी समझते हैं | रस विदों ने केंद्र को कैसे समझा ? और रसायन शास्त्रियों ने इसे कैसे व्याख्या किया है | रसायन शास्त्र का अर्थ है chemistry | जो विज्ञान के छात्र रहे हैं उन्हें ये chemistry पता होगी | पारे से काम और पारे पर काम ये है रस विद्या | रस विद्या का क्रमिक विकास नहीं हुआ है | जैसा की chemistry का हुआ है | रस विद्या उन लोगों की देन है जो अदृश्य में भी झांक सकते थे | गोविंदपाद, रसेश्वर जैसे सिद्ध महात्मा | गोविंदपादाचार्य तो आदि शंकर के गुरु रहे हैं | तो रस विद्या खोजी नहीं गई | सीधी ही उपलब्ध करा दी गई | केमिस्ट्री का क्रमिक विकास हुआ है | केमिस्ट्री में आज भी शोध जारी हैं | हर महीने दो महीने में कुछ नया खोज लेते हैं | रस विद्या पूर्ण है जिसे किसी शोध की आवश्यकता नहीं है | 

Hydrogen oxygen के साथ मिलेगी पानी बन जाएगा सीधा सूत्र है | पूरा रसायन शास्त्र सूत्रों पर ही आधारित है | रस विद्या में कोई सूत्र होता ही नहीं है | इसे तो समझने के लिए भी आपको महात्मा की दृष्टि चाहिए होती है | यही वजह है chemistry, physics में बहुत बड़े वैज्ञानिक हुए हैं जिन्होंने atom bomb बना दिया लेकिन सोना नहीं बना पाए हैं | कुछ तो वजह होगी | आज के समय में सभी अत्याधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं लेकिन रस विद्या किसी को समझ ही नहीं आती है | क्योंकि रसायन शास्त्र अभी सतह पर है | या यूं कहें सतह से अंदर की ओर गतिमान है | जबकि रस विद्या जहां से मनुष्य बनाने का पहला पुर्जा लगता हैं वहाँ से शुरू होती है | मनुष्य का assemble और dismantle रस विद्या है | इस एक लाइन को और तरीके से समझते हैं | यदि किसी मनुष्य को ब्रह्म की प्राप्ति करनी है तो क्या करना होगा ? एक-एक करके सभी कर्मों को समाप्त करना | जब कोई कर्म बाकी ही नहीं बचा तो सिर्फ आत्मा ही बचेगी | यही है dismantle | और फिर से मनुष्य का निर्माण करना ये है रस विद्या | बने हुए मनुष्य में परिवर्तन करना है ये भी रस विद्या है |

रसायन शास्त्र वर्तमान समय में मनुष्य या अन्य कोई जीव बना ही नहीं सकता है | हाँ चिकित्सा कर सकता है | लेकिन बना नहीं सकता है | लेकिन रस विद्या है मनुष्य निर्माण की कीमिया | रस विद्या है धातु निर्माण की कीमिया | ये सीधा ही परमात्मा के क्षेत्र में हस्तक्षेप है | यहाँ हम मनुष्य और धातु साथ ही तुलना करते हुए चलेंगे जिससे बात ठीक से समझ आ जाएगी | मनुष्य को अजर अमर करने से क्या अर्थ है ? जहां से मनुष्य के जन्म जन्मांतर तय होते हैं वहाँ जाकर परिवर्तन करना | मनुष्य के शरीर में जहां मनुष्य के कर्म संचित होते हैं | मैंने इसके लिए मनुष्य की hard drive शब्द प्रयोग किया था | जहां मनुष्य के वो कर्म संचित होते हैं जो तय करते हैं अगला जन्म और जीवन क्या कैसा होगा ? वहाँ परिवर्तन करना | अभ्रक दीर्घायु बनाता हैं | स्वर्ण रोग, वृद्धावस्था के कारकों को नष्ट करता है | लेकिन इन्हें वहाँ पहुंचाया कैसे जाएं जहां मनुष्य के कर्म संचित हैं ? इसके लिए पारे का प्रयोग किया गया | पारा, अभ्रक सत्व और स्वर्ण बीज को एक आत्मा बना दिया गया | पारे का स्वभाव है की वो केंद्र की ओर ही जाएगा | उसके घनत्व के कारण | बस उसे प्रोग्राम करना होता है | 

इस बात को ठीक से समझना | महात्मा ये जानते हैं | मानते नहीं हैं जानते हैं | मनुष्य में एक से अधिक केंद्र होते हैं | एक बात को और यहाँ समझ लेते हैं रस विद्या मनुष्य, पेड़, पहाड़, और अन्य सभी जीवों, धातुओं को एक ही तरीके से समझते हैं | सभी के अंदर जैविक चेतना है | अगर जैविक चेतना नहीं होगी तो मरे हुए में परिवर्तन संभव नहीं होगा | तो धातु और मनुष्य दोनों को रस विद्या जैविक ही मानता है | दोनों में ही चेतना है यही कारण है उनमें परिवर्तन संभव हो पाता है | जिन लोगों में वनस्पतियों से पारा निकाला होगा उन्होंने पारे में जैविक चेतना देखी होगी | आप धातु मानना बंद कर देंगे | यही वजह है महात्मा पारे का मारण नहीं करते हैं | क्योंकि उसमें मनुष्य के समान ही चेतना है | 

लेकिन विज्ञान में जिंदा और मरों के लिए अलग ही परिभाषा है | जो अपने समान संतान उत्पत्ति कर सके, जिनमें वृद्धि और विकास हो वो जीवित हैं | ये बड़ा फरक है | ये बड़ी वजह है विज्ञान सोना नहीं बना पाया है | जो कुछ भी वो कर रहे है वो नौटंकी ज्यादा है | लागत ज्यादा होती है | और हाथ भी कुछ नहीं आता है | मैं किसी धातु का चित्र दे दूंगा जिससे आपको रसायन विज्ञान का केंद्र समझ में आ जाएगा | बस अभी ये समझना है रसायन विज्ञान सतह पर है | इसे अभी लंबी यात्रा करनी होगी वास्तविक केंद्र को समझने के लिए | रसायन शास्त्र के केंद्र (nucleus) अलग है जिसमें न्यूट्रॉन, प्रोटॉन होते हैं | इलेक्ट्रॉन इस nucleus के चारों ओर चक्कर लगाते हैं | धातु का प्रत्येक टुकड़ा अणुओं से बना है | हर अणु परमाणुओं से बना है | परमाणु में केंद्र होता है | ये रसायन शास्त्र है | अब एक ताम्र के टुकड़े में लाखों परमाणुओं में केंद्र को कैसे locket करेंगे ? हर केंद्र में परिवर्तन करना होगा तब हर परमाणु स्वर्ण में बदलेगा | उसके बाद छोटा टुकड़ा स्वर्ण बनेगा |

रस विद्या ये मानती है किसी भी जीव के अंदर दो केंद्र होते हैं | हम मनुष्य का ही उदाहरण ले लेते हैं | प्रथम केंद्र है आत्मा जो सभी जीवों में होती है | इस आत्मा में कोई तरीके से परिवर्तन संभव ही नहीं है | बस ये जब अज्ञान से घिरी होती है तो जीव होती है और जब मुक्त होती है तब ब्रह्म होती है | तो मनुष्य के अंदर प्रथम केंद्र है आत्मा जो पूर्णतः अपरिवर्तनशील है | मनुष्य दो ही चीजों से मिलकर बना है प्रथम आत्मा दूसरा उसके ऊपर कर आवरण | इस आवरण को ही जीव कहते हैं |

जीव+आत्मा मिलकर बनती है जीवात्मा | यहाँ एक तो आत्मा केंद्र हो गई | सब आत्मा के ही चारों ओर घटित हो रहा है | लेकिन आत्मा जीव को संचालित नहीं करती है | बस एक अज्ञान का पिंजड़ा है | जिसमें आत्मा कैद है | दूसरा केंद्र हुआ जीव का | जीव जो कुछ भी करता है उसके जन्म जन्मांतर उसी से तय होते हैं | लेकिन आखिर ये कर्म जीव के अंदर कहीं तो संचित होते होंगे | इसे ही जीव का केंद्र कहा जाता है | यदि इसी जैविक केंद्र में कोई परिवर्तन कर दिया जाए तो समूल जीव बदल जाएगा | एक पापी मनुष्य महात्मा हो जाता है | रत्नाकर डाकू वाल्मीकि हो गया | ये आत्मा में परिवर्तन नहीं हुआ है | बल्कि ये जीव के अंदर के केंद्र में परिवर्तन हुआ है | क्योंकि वो मनुष्य शरीर अभी है | लेकिन बदल गया है | तंत्र, मंत्र, योग, ध्यान, ज्ञान ये सभी मनुष्य के जीव के केंद्र में घटित हो रहे हैं | तो परिवर्तन भी जैविक शरीर में ही होता है | ये जैविक शरीर का परिवर्तन ही कीमिया है | आपने कमल के फूल को गुलाब बना दिया ये कीमिया है | लेकिन ये घटित तो शरीर में हुई है | 

तो शरीर के मूल केंद्र में जो भी घटित होता है उसका मौलिक केंद्र आत्मा से कुछ लेना देना नहीं होता है | तो एक केंद्र जीव के अंदर हुआ | दूसरा केंद्र स्वयं आत्मा है | ताम्र का स्वर्ण में परिवर्तन ये जैविक परिवर्तन है | बाहर या जगत में परिवर्तन हो रहा है | जगत में चीजें बदल रही हैं | लेकिन मौलिक केंद्र आत्मा स्थिर है | तो ताम्र का स्वर्ण बनाने के लिए ताम्र के जैविक केंद्र में परिवर्तन करना होता है | ये तत्व निर्माण की प्रक्रिया हिंदुओं में सनातन है | सिर्फ ताम्र, सीसा या चांदी से सोना नहीं बल्कि समूल प्रकृति में परिवर्तन का विज्ञान हमारे ऋषियों के पास था | यहाँ तक कि वो नया ब्रह्मांड भी बना सकते थे | कपालियों तो गंधक, नमक और पारे के माध्यम से शब्द बेध का पारा बना दिया था | शब्द ब्रह्म को कहा जाता है | नए ब्रह्मांड रचना का सूत्र है | तो हम केंद्र सनातन काल से ही जानते हैं | जगत और केंद्र ये तो हमेशा सत्संग का हिस्सा रहा है |

अब एक श्लोक से बात को समझते हैं | ये रस मंजरी से है मैं इसे हिन्दी में लिख देता हूँ | “पारद बंधन को धन्य है, क्योंकि ये मृत होकर पूरी पृथ्वी को प्राण दे सकता है | यह सिद्ध होकर पृथ्वी को जरा मरण से मुक्ति दे सकता है” | एक है जीव का बंधन जो नारकीय है | दूसरी ओर जब पारा बंधन में पड़ता है तब लगभग सभी रस ग्रंथों की यही परिभाषा है पारे को लेकर | मूर्छित होने पर रोगों को हरता है | बद्ध होने पर मुक्ति देता है, और भली भांति मृत होने पर मनुष्य को अजर अमर बना देता है | एक तरफ है जीव का बंधन | जहां हमेशा जीव को बंधन से मुक्त करने के लिए सैकड़ों विधान कहे गए हैं | वहीं ऋषि कहते हैं पारद को पहले आप बंधन में डालें तभी कोई कार्य सिद्धि संभव है | ये बात तो सिर्फ किसी जीवित के लिए ही कहा सकता है | तो पारे को धातु न मानते हुए ऋषि जैविक चेतना मानते हैं | जैसे मनुष्य एक जैविक चेतना है और आत्मा प्रथक है ठीक वैसे ही पारा भी है | 

पारा वो जो बंधन में हैं | तो जगत है | और पारा वो जो स्वतंत्र है | जो स्वतंत्र पारा है वही शिव है | यही समझ हमारी अन्य धातुओं को लेकर भी है | यही वजह है हम धातुओं ठीक वैसे ही परिवर्तन कर पाते हैं जैसे मनुष्य के भीतर होता है | धातु और मनुष्य के अंदर का परिवर्तन अलग नहीं है बल्कि अलग परिस्थितियों में है | अगर ताम्र का स्वर्ण में, और स्वर्ण का प्लेटिनम में परिवर्तन होता है | यही तो सिद्धार्थ से बुद्ध और बुद्ध से ब्रह्म होने की प्रक्रिया है | तो सबसे पहले केंद्र का ज्ञान हमें सनातन काल से ही है तभी तो जगत, आत्मा और ब्रह्म हुआ जाता है | मनुष्य और धातु को रस विद्या एक ही दृष्टि से देखती है | इसीलिए रस विद्या में जो पारा बनाया गया वो लोह वेध और देह वेध के लिए एक ही था | एक तरह के पारे से धातु और मनुष्य दोनों के केंद्र में परिवर्तन किया गया है |

एक अन्य और उदाहरण को समझते हैं | “काष्ठ औषधियाँ सीसे में विलीन होती हैं, सीसा रांगे  में विलीन होता है, राँगा ताम्र में विलीन होता है, ताम्र चांदी में विलीन होता है, चांदी स्वर्ण में विलय होती है | और स्वर्ण पारे में विलीन होता है” | जैसे योगीजन शिव में लय होकर मुक्ति को प्राप्त होते हैं | उसी प्रकार से अभ्रक भक्षी पारद में स्वर्ण आदि सभी धातुएँ विलय होती हैं | अतः जिस प्रकार से सभी प्राणी परमात्मा में विलय हो जाते हैं | उसी प्रकार से पारे में सभी धातुएँ विलय हो जाती हैं | इस दो उदाहरणों से ये बात तो समझ में आ जाती है कि पारे या अन्य धातुओं को लेकर रसाचार्यों की क्या समझ रही है | ये सभी सिद्ध पारे को पूर्णतयः चैतन्य तत्व मानते हैं | जो सब प्रकार के बंधन से मुक्त है वो पारा है |

आगे कहा गया है इसलिए जो भी योगी जीवन मुक्ति चाहते हैं वो पहले गंधक योग से पारे को बंधन में डालें | पारा शिव, गंधक पार्वती तत्व कहा गया है | ये तो दोनों ही केंद्र हैं | ये समझने जैसा है | शिव परमात्मा हैं पार्वती जगत हैं | तो परमात्मा तो स्वयं केंद्र है ही | पार्वती जगत हैं तो जगत का भी अपना एक केंद्र होगा ? क्योंकि परमात्मा जगत का संचालन नहीं करता है | जगत का अपना autonomous system है | लेकिन आखिर ये जगत भी तो कही से संचालित होगा | उसी को केंद्र कहा जाता है | तो एक तो परमात्मा केंद्र है ही | दूसरा जगत का अपना भी केंद्र हो गया | ये सिद्धांत काम करता है | पूरी रस विद्या का आधार यही है |

पारा याने मुक्त, पारा याने शिव, पारा याने परमात्मा | जो हमेशा अपरिवर्तनशील है | पारा ही क्यों कोई अन्य धातु क्यों नहीं | क्योंकि पारा स्वयं केंद्र है उसका बहाव हमेशा केंद्र की ओर ही होता है | ये जाएगा ही केंद्र की | तो इसे केंद्र ढूँढने में कोई दिक्कत नहीं होती है | जैसे पानी का स्वभाव है पानी नीचे की ओर बहेगा | नदी सागर से ही जाकर मिलेगी | नदी का स्वभाव है | वैसे ही पारे का स्वभाव है वो केंद्र की ओर ही बहेगा | यही कारण पारा ज्ञानियों, ध्यानियों, तांत्रिक, मंत्रिकों की प्रथम पसंद रहा है | अघोर पंथ, नाथ संप्रदाय में भी देखिए | मत्सेन्द्र नाथ, गोरखनाथ जैसों को | इन्हें सोने से क्या लेना देना ? लेकिन यहाँ भी पारा मिलेगा | 

मनुष्य शरीर में कई केंद्र होते हैं | रस विद्यकारों या जिन्हें अजर अमर होना था, उन्होंने उस केंद्र को पकड़ा जहां मनुष्य के सभी कर्म संचित होते हैं | उसमें से जो नहीं चाहिये उसे नष्ट करना था और उपयोगी को जोड़ना था | ये तो कोई मुश्किल काम नहीं है | मुश्किल काम है उस जगह को सही तरह से locket करना | आखिर ये जगह मनुष्य शरीर में कहाँ है | और वहाँ तक कैसे पहुंचा जाए | तो बस पारे को प्रोग्राम करना है | पारे को प्रोग्राम करना आसान है | जिसमें रस सिद्ध सफल हुए | उसके बाद कई पंथों ने इस प्रयोग को अमल में लाया | ज्ञानियों के लिए मस्तिष्क केंद्र है | भक्ति मार्गी के लिए हृदय केंद्र है | तांत्रिक के लिए काम केंद्र है | नाथ संप्रदाय वालों के लिए endocrine ग्लैंड्स केंद्र हैं | बस पारे को प्रोग्राम किया पारा स्वयं ही वहाँ आवश्यक सामग्री लेकर पहुँच जाता है | 

तो पारे को केंद्र ढूँढना नहीं है | बल्कि उलट कई बार इसकी दिशा रोकनी होती है | पहले से इसे प्रोग्राम करके बताना होता है कौन से केंद्र पर जाना है | यही बात रसचार्यों ने कहीं है पहले पारे को बंधन में डालो तभी कोई कार्य सिद्धि संभव है | अगर कोई आपके बंधन में है तो उससे जो चाहे सो करवा लेंगे | तो सभी अपनी जरूरत के अनुसार पारे को बंधन में डाल लेते हैं | किसी को आयुर्वेद करना है तो उसके लिए एक standard बना दिया गया है | पहले इसके अष्ट संस्कार करो | उसके बाद इससे औषधि निर्माण कर्म करना है | अगर किसी को धातु कीमिया करना है तो उस योग्य बंधन में डालना होगा |

प्रश्न है केंद्र में परिवर्तन कैसे | हजार साल पहले जो रस विद्या कार थे उन्होंने केंद्र शब्द का प्रयोग नहीं किया है | लेकिन उन्होंने जिस पारे को बनाने की विधि कीमिया के लिए कही है | वो काम करता है | इसे एक उदाहरण से समझते हैं | यदि पारे को षड्गुण अंतरधूम गंधक जारित कर दिया जाए तो | ये शतांश वेध करता है | यदि हजार गुना गंधक जारित करे तो ये सहस्रांश वेध करता है | इसी प्रकार से कोटी वेधी और शब्द वेधी पारा भी बनाया | थोड़ा दिमाग लगाइए | मैं पीछे विश्वामित्र द्वारा बनाए गए षड्गुण गंधक जारित रस सिंदूर को कह चुका हूँ | जिसमें साफ लिखा है | ये ताम्र, सीसे और चांदी में शतांश से वेध करता है | आप इससे क्या समझते हैं ? ये सभी calculated है | ये वैदिक गणित से calculated है | 99 ग्राम ताम्र पर 1 ग्राम पारद भस्म डालनी है | 

इसका अर्थ है 99 ग्राम ताम्र में जितने भी परमाणु है उनके nucleus का वेध ये 1 ग्राम भस्म कर देगी | पारा केंद्र की ओर ही जाएगा | और प्रत्येक परमाणु का रंजन हो जाएगा | इसमें आपको केंद्र नहीं ढूँढना है | आपने जो पारा बनाया है वो केंद्र को ढूंढ ही लेगा | और पूरा गणित करके आपको पहले बता दिया गया है | कि 1 ग्राम पारा 99 ग्राम ताम्र एक सभी परमाणुओं को रंजित कर देगा | पुराने समय में कही रस ग्रंथों में केंद्र शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है | और अगर बता भी देते तो आप इसे किस प्रकार से ढूंढ पाते | एक ध्यानी पूरा जीवन लगा देता है अपने ही जीवन का केंद्र ढूँढने में | तो ऋषियों ने वो पारा बनाया जो स्वयं ही सीधा केंद्र तक पहुंचेगा | 999 ग्राम ताम्र पर 1 ग्राम से वेध या 9999 ग्राम ताम्र पर एक ग्राम पारे से वेध इसे अगले लेख में समझेंगे | 

अभी मात्र इतना ही समझ लीजिए आत्मा यदि शुद्ध है तो शुद्ध आत्मा से ही मिलेगी | जैसे किसी के शरीर या सिर में दर्द है | आप paracetamol लेते हैं तो क्या होता है ? सिर दर्द ठीक हो गया लेकिन औषधि ने किया क्या ? कैसे औषधि को पता चला सिर कहाँ है इसमें दर्द कहाँ है | वो औषधि का काम है | शरीर के जिस हिस्से के लिए प्रोग्राम किया गया है वो वहीं जाकर काम करेगी | आपको इसके लिए अलग से कुछ नहीं करना होता है | अन्य सभी औषधियाँ भी ऐसी ही हैं | वो जहां के लिए बनाई गई हैं वही जाकर काम करती हैं |  

ऐसे ही पारा भी बनाया जाता है | केंद्र रसायन शास्त्र ढूँढता है | रस विद्या में इसे ढूँढना नहीं है | क्योंकि जहां पारे को भेजना है वो जगह तो आँखों से देखा भी नहीं जा सकता है | और हजार साल पहले जब से पारा अजर अमर होने के लिए प्रयोग हो रहा है ?? तब क्या स्थिति रही होगी | कोई तकनीकी नहीं है आप आज भी नहीं देख सकते हैं मनुष्य के कर्म कहाँ संचित होते हैं | सारी जिंदगी ध्यान साधना करते निकल जाता है | इसीलिए फॉर्मूला शब्द प्रयोग किया जाता है | मंत्र भी एक फॉर्मूला है | गायत्री, पंचाक्षरी, गुरु मंत्र यही मंत्र क्यों जगत के बाहर ले जाते हैं | वशीकरण का अलग मंत्र, सरस्वती का अलग | ये सभी फॉर्मूले ही है कुछ पाने के लिए या कुछ खोने के लिए | रस विद्या सिर्फ पारे का विज्ञान है | रसायन शास्त्र में सभी धातुएँ, उपधातुएं  आती हैं | ये बड़ा फर्क है |

साभार tatvmadrshi Facebook 

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प्राचीन ग्रीस के वैभवशाली इतिहास

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प्राचीन ग्रीस के वैभवशाली इतिहास 



प्राचीन Greece के वैभवशाली इतिहास के पीछे कई ऐसे “गुप्त कारण” माने जाते हैं जिन्होंने उसे ज्ञान, दर्शन, विज्ञान, कला और युद्धक शक्ति में महान बनाया। इनमें कुछ प्रमुख कारण थे:


भौगोलिक स्थिति

ग्रीस समुद्रों से घिरा था, जिससे व्यापार और विभिन्न सभ्यताओं से संपर्क बढ़ा। इससे नए विचार, तकनीक और धन आया।


नगर-राज्य व्यवस्था (City-States)

जैसे Athens और Sparta।

हर नगर-राज्य अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए शिक्षा, सेना और प्रशासन को मजबूत करता था।


लोकतंत्र और विचार स्वतंत्रता

विशेषकर एथेंस में लोगों को विचार रखने की स्वतंत्रता थी। इसी कारण Socrates, Plato और Aristotle जैसे महान दार्शनिक उभरे।


ज्ञान और विज्ञान पर जोर

गणित, खगोलशास्त्र, चिकित्सा और दर्शन में ग्रीक विद्वानों ने गहरी खोज की।

Pythagoras और Hippocrates इसके उदाहरण हैं।


सैन्य शक्ति और अनुशासन

स्पार्टा की सेना अत्यंत अनुशासित थी।

बाद में Alexander the Great ने विशाल साम्राज्य बनाकर ग्रीक संस्कृति को एशिया और मिस्र तक फैला दिया।


मिथक और धर्म का प्रभाव

ग्रीक देवताओं और महाकाव्यों ने लोगों में वीरता, कला और सांस्कृतिक एकता की भावना जगाई।

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प्राचीन ग्रीस के वैभवशाली इतिहास के पीछे एक ऐसा गुप्त कामुकता का अध्याय

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 प्राचीन Greece में “सिम्पोजियम” (Symposium) वास्तव में उच्च वर्ग के पुरुषों की एक सामाजिक सभा होती थी। यहाँ लोग भोजन के बाद एकत्र होकर शराब पीते, संगीत सुनते, कविता पाठ करते, दर्शन, राजनीति और कला पर चर्चा करते थे।

प्राचीन ग्रीस के वैभवशाली इतिहास के पीछे एक ऐसा गुप्त

प्राचीन Greece के वैभवशाली इतिहास के पीछे कई ऐसे “गुप्त कारण” माने जाते हैं जिन्होंने उसे ज्ञान, दर्शन, विज्ञान, कला और युद्धक शक्ति में महान बनाया। इनमें कुछ प्रमुख कारण थे:

  1. भौगोलिक स्थिति
    ग्रीस समुद्रों से घिरा था, जिससे व्यापार और विभिन्न सभ्यताओं से संपर्क बढ़ा। इससे नए विचार, तकनीक और धन आया।
  2. नगर-राज्य व्यवस्था (City-States)
    जैसे Athens और Sparta
    हर नगर-राज्य अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए शिक्षा, सेना और प्रशासन को मजबूत करता था।
  3. लोकतंत्र और विचार स्वतंत्रता
    विशेषकर एथेंस में लोगों को विचार रखने की स्वतंत्रता थी। इसी कारण Socrates, Plato और Aristotle जैसे महान दार्शनिक उभरे।
  4. ज्ञान और विज्ञान पर जोर
    गणित, खगोलशास्त्र, चिकित्सा और दर्शन में ग्रीक विद्वानों ने गहरी खोज की।
    Pythagoras और Hippocrates इसके उदाहरण हैं।
  5. सैन्य शक्ति और अनुशासन
    स्पार्टा की सेना अत्यंत अनुशासित थी।
    बाद में Alexander the Great ने विशाल साम्राज्य बनाकर ग्रीक संस्कृति को एशिया और मिस्र तक फैला दिया।
  6. मिथक और धर्म का प्रभाव
    ग्रीक देवताओं और महाकाव्यों ने लोगों में वीरता, कला और सांस्कृतिक एकता की भावना जगाई 
प्राचीन ग्रीस के वैभवशाली इतिहास के पीछे एक ऐसा गुप्त अध्याय छिपा है, जहाँ रईसों की 

प्राचीन Greece में “सिम्पोजियम” (Symposium) वास्तव में उच्च वर्ग के पुरुषों की एक सामाजिक सभा होती थी। यहाँ लोग भोजन के बाद एकत्र होकर शराब पीते, संगीत सुनते, कविता पाठ करते, दर्शन, राजनीति और कला पर चर्चा करते थे।

हालाँकि, कई सिम्पोजियम में मनोरंजन के रूप में नृत्य, संगीत और कभी-कभी कामुक वातावरण भी मौजूद होता था। उस समय की सामाजिक परंपराएँ आज के नैतिक मानकों से अलग थीं। कुछ ऐतिहासिक स्रोत बताते हैं कि शराब के अधिक सेवन और विलासिता के कारण ऐसी सभाएँ कभी-कभी अत्यधिक उन्मुक्त भी हो जाती थीं।

लेकिन यह कहना कि सिम्पोजियम केवल “गुप्त हवस भरी पार्टियाँ” थीं, इतिहास को एकतरफा तरीके से प्रस्तुत करना होगा। इन्हीं सभाओं में Plato ने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ Symposium लिखा, जिसमें प्रेम, सौंदर्य और दर्शन पर गहरी चर्चा है।

यानी सिम्पोजियम प्राचीन ग्रीक समाज का ऐसा मिश्रण थे जहाँ:

  • बौद्धिक चर्चा,
  • राजनीति,
  • कला और संगीत,
  • शराब और विलासिता

सब एक साथ मौजूद थे।



प्राचीन ग्रीस के वैभवशाली इतिहास के पीछे एक ऐसा गुप्त अध्याय छिपा है, जहाँ रईसों की शामें सिर्फ दर्शन और राजनीति की चर्चाओं में नहीं, बल्कि चरम का*मुकता के साये में ढलती थीं। इसे कहा जाता था 'सिम्पोजियम'—दिखने में तो यह बुद्धिजीवियों की एक सभा थी, लेकिन हकीकत में यह अमीरों की वो 'सीक्रेट' पार्टी थी जहाँ शराब की हर बूंद के साथ ह*वस का नशा गहरा होता जाता था।


इन महफिलों में एथेंस के ताकतवर पुरुष अर्ध*नग्न होकर मखमली बिस्तरों पर लेटते थे, जहाँ उनके मनोरंजन के लिए 'हेटेरा' (उच्च वर्ग की बेहद खूबसूरत और शिक्षित दासियाँ) को खास तौर पर बुलाया जाता था। ये दासियाँ केवल संगीत या नृत्य के लिए नहीं होती थीं, बल्कि उनका मुख्य काम पुरुषों की हर दबी हुई जि*स्मानी चाहत को पूरा करना था। 


जैसे-जैसे रात परवान चढ़ती और सुराही से शराब छलकती, वैसे-वैसे वहां मौजूद लोगों की मर्यादाएं पिघलने लगती थीं। रोशनी के धुंधलके में संगीत की धुनें और भी उत्तेजक हो जाती थीं और अजनबियों के बीच जि*स्मानी नज़दीकियों का वो खेल शुरू होता था, जिसकी कल्पना भी आज का समाज नहीं कर सकता।


यह सभाएँ अक्सर बेकाबू होकर एक ऐसी 'ओरजी' में बदल जाती थीं, जहाँ नैतिकता का कोई स्थान नहीं था। दार्शनिक बातों के बीच शुरू हुआ यह सिलसिला सुबह होते-होते जिस्मानी सुख के चरम पर जाकर रुकता था। 


इतिहासकार बताते हैं कि इन बंद कमरों के भीतर वह सब कुछ जायज था जो बाहर की दुनिया में वर्जित था। सिम्पोजियम केवल एक पार्टी नहीं, बल्कि उस दौर के रईसों के लिए अपनी मर्दानगी और ह*वस को बेलगाम छोड़ने का एक आलीशान बहाना था। आज भी इन सभाओं के किस्से सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि कैसे ज्ञान की आड़ में कामुकता का ऐसा नंगा नाच परोसा जाता था। साभार सोनाली bist

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शुक्रवार, 15 मई 2026

सम्भोग और समाधि

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संभोग की 


इस प्रक्रिया में 


जो तत्व 


एक साथ आते हैं, 


उन्हें 


शिव और शक्ति के 


नाम से जाना जाता है। 


शिव पुरुष या चेतना का 


प्रतिनिधित्व करते हैं 


और 


शक्ति प्रकृति या ऊर्जा का 


प्रतिनिधित्व करती है। 


शक्ति, 


विभिन्न रूपों में, 


सभी सृष्टि में मौजूद है। 


भौतिक और आध्यात्मिक 


दोनों ऊर्जा को 


शक्ति के रूप में 


जाना जाता है। 


जब ऊर्जा 


बाहर की ओर जाती है, 


तो यह 


भौतिक ऊर्जा होती है 


और 


जब यह ऊपर की ओर 


निर्देशित होती है, 


तो यह आध्यात्मिक ऊर्जा होती है। 


इसलिए, 


जब तंत्रयोग में 


साधिका और साधिका   


के बीच संभोग का 


सही तरीके से 


अभ्यास किया जाता है, 


तो इसका 


आध्यात्मिक जागरूकता 


के विकास पर 


बहुत सकारात्मक 


प्रभाव पड़ता है।


साधक आनंदमुक्त

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बुधवार, 13 मई 2026

अघोरी के चमत्कार

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 🌹:अघोरी के चमत्कार:🌹

         अघोरियों के चमत्कारों और उनकी सिद्धियों के बारे में अनेक लेख पढ़े होंगे। मगर किसी ने यह सोचा है कि ये सिद्धियां उनके पास आती कैसे हैं  जिनके बल पर वे अलौकिक चमत्कार करते हैं।

      तांत्रिक साधना का एक सशक्त पक्ष परामनोविज्ञान पर आधारित है। उस पक्ष के अंतर्गत कई साधना और सम्प्रदाय हैं जिनमें एक है--'अघोर सम्प्रदाय'। 'घोर' शब्द का मतलब 'संसार' है, 'अ' नकारात्मक है अर्थात् जो संसारी नहीं है, वह 'अघोरी' है। इसी अघोरी शब्द का बिगड़ा रूप 'औघड़' है। यह अति प्राचीन सम्प्रदाय है। लेकिन इससे भली-भांति लोग परिचित हुए बाबा कीनाराम के समय से। गोस्वामी तुलसीदास के समकालीन बाबा कीनाराम 'अघोर' संप्रदाय के उच्चकोटि के सिद्ध महात्मा और सन्त थे जिनकी समाधि वाराणसी के 'शिवाला' मोहल्ले में आज भी दर्शनीय है। शरीर, संसार, समाज की मर्यादा के बन्धनों के कारण 'मन में जड़ता' आ जाती है। इस जड़ता को दूर करने के लिए 'मन का स्वतंत्र होना' ज़रूरी है।

      इस सम्प्रदाय में मल-मूत्र का सेवन, अन्य नशीली वस्तुओं का प्रयोग, नग्न विचरण, गाली-गलौज आदि अक्सर देखने-सुनने को मिलता है। इन सवसे मन की वृत्तियाँ उन्मुक्त होने लगती हैं और मन की जड़ता दूर होने लगती है।

     मन की दो मुख्य अवस्थाएं हैं--चेतन और अचेतन। अचेतन मन में अकल्पनीय और अविश्वसनीय शक्तियां विद्यमान रहती हैं। वे शक्तियां जब अचेतन मन की सीमा लांघकर चेतन मन में प्रकट होती हैं तो उनके चमत्कार भरे कौतुक साधारण लोगों को हतप्रभ कर देते हैं। साधारणतया जीवित मनुष्य चेतन मन के द्वारा कार्य करता है। लेकिन मरने के बाद जब शरीर का बन्धन टूट जाता है तो उस स्थिति में वह अचेतन मन की अवस्था में क्रियाशील हो उठता है। इसीलिए प्रेतात्माओं में मनुष्य से ज्यादा शक्ति, सामर्थ्य और कार्य क्षमता होती है। अगर किसी जीवित व्यक्ति के अचेतन मन से इस प्रकार की किसी प्रेतात्मा का स्थायी सम्बन्ध जुड़ जाय तो वह मनुष्य चेतन मन के स्थान पर अचेतन मन के द्वारा कार्य करने लग जायेगा और वह जो कार्य करेगा, वह हतप्रभ करने वाला, अलौकिक होगा, चमत्कारपूर्ण होगा और होगा मानवेतर शक्ति संपन्न। इसी को हम साधारण रूप से 'सिद्धि' के नाम से पुकारते हैं।

     अघोर साधना और उसकी जैसी अन्य तांत्रिक साधनाओं के शास्त्रविहीन सिद्धांतों को विज्ञान के मूलभूत तथ्यों से बहुत बल मिलता है। चेतन मन के विचार तरंगों को केंद्रित कर जिस अवस्था की प्राप्ति होती है, उसी को साधना में ज्ञान की संज्ञा दी गयी है। अचेतन मन की विचार तरंगों को केंद्रित करने पर जिस अवस्था की प्राप्ति होती है, उसे योग में 'सविकल्प समाधि' कहते हैं। इसी प्रकार उसके दूसरे रूप के अन्तर्गत जिसे 'अमन की अवस्था' कहते हैं, उसमें उठने वाली तरंगों को केंद्रित करने पर साधक को जिस स्थिति की अनुभूति होती है, उसे 'निर्विकल्प समाधि' कहते हैं।

      निर्विकल्प समाधि की स्थिति में केंद्रित हुई विचार तरंगें 'अल्फ़ा' तरंगों का रूप धारण कर लेती हैं। उस समय अधिक मात्रा में मस्तिष्क से वे निकलतीं हैं और उनकी गति भी अधिक तीव्र होती है। किन्तु सविकल्प समाधि की स्थिति में उनकी मात्रा और गति शून्य होती है। उस समय व्यक्ति से प्रचुर मात्रा में बीटा, अल्फ़ा और डेल्टा नामक तरंगें निकलती हैं। यदि ये तीनों तरंगे आपस में मिल जाएँ तो शरीर को पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति प्रभावित नहीं कर पाती है।

     कुछ वर्ष पूर्व वाराणसी में नगवा घाट पर एक ऐसे ही साधक रहते थे। रात्रि में शून्यमार्ग से वे विचरण किया करते थे। सन्त टैरेसा जब अपनी उपासना के समय ध्यानावस्थित होती थीं तो कभी-कभी पृथ्वी के ऊपर उठ जाती थीं। यह ऊपर उठने की शक्ति कभी-कभी प्रकृति की ओर से भी उपहार सरूप लोगों को उपलब्ध हो जाती है जिसका रहस्य स्वयं उन्हें पता नहीं होता। 1952 में मैसाच्युसेट्स के बार नामक स्थान पर श्रीमती 'चेनसी' का शरीर अचानक धीरे-धीरे उठकर फर्श और छत के बीच अधर में लटक गया था। इसी प्रकार हवा में उड़ने की शक्ति 'डा.डी होम' नामक व्यक्ति में भी थी। 1868 में लन्दन में एक विशेष समारोह में वे फर्श से उठकर अचानक छत से जा लगे और खिड़की से निकलकर उड़ते हुए तीसरी मंजिल में पहुँच गए थे।

     सविकल्प समाधि की अवस्था में यदि 'अल्फ़ा' तरंगों का सम्बन्ध केवल 'बीटा' तरंग से जुड़ जाय तो हज़ारों मील दूर बैठे  व्यक्ति के विचारों और इच्छाओं का तुरंत ज्ञान प्राप्त हो सकता है।

      इसी प्रकार के एक अघोरी महात्मा मानसरोवर से पधारे थे। वे दूर और समीप के लोगों के विचार, भाव और इच्छाओं को तुरन्त जान-समझ लेते थे। यही नहीं 3-4 घण्टे बाद कौन-सा विचार उत्पन्न होगा, कौन-सा भाव और कौन-सी इच्छा उत्पन्न होगी--यह भी जान-समझ लेते थे और बतला दिया करते थे। और जो बतला देते थे, वही होता भी था। इसी प्रकार यदि प्रखर और तीव्रगामी 'अल्फ़ा' तरंगों के साथ 'डेल्टा' तरंग मिल जाये तो दूर बैठे किसी भी व्यक्ति के विचारों को जानने-समझने के आलावा उसके स्वरूप का भी वर्णन करना सम्भव है।

     पूना के 'बल्लभ शास्त्री निर्विकार' अपने समय के बहुत बड़े वैद्य थे। 1949 में वाराणसी में काशीलाभ के लिए आये थे। उस समय उनकी उम्र 90 वर्ष की थी। अपनी माँ का चित्र बनवाना चाहते थे। मगर वह जिस प्रकार माँ के रूप का वर्णन कर रहे थे, उसके अनुसार कोई चित्र नहीं बन पा रहा था। बड़े ही दु:खी थे महाशय। माँ का कोई चित्र या फोटोग्राफ भी नहीं था। उन्ही दिनों वाराणसी के प्रसिद्ध महात्मा हरिहर बाबा के निकट एक अघोरी सन्यासी पधारे थे। उनके नेत्रों में विचित्र प्रकार की प्रखर ज्योति थी जो अँधेरे में भी चमकती थी। वे यदि जलते हुए दीपक की ओर ताक लेते थे तो वह तुरंत बुझ जाता था। उन्हें जब निर्विकार महोदय की समस्या पता चली तो वे उनको बुलवा कर बोले--आप अपनी माँ के स्वरूप का मन में ध्यान करिये। 

      निर्विकार महोदय ने वैसा ही किया। जब वे ध्यान करने लगे तो सन्यासी महोदय उनके हृदय पर नेत्र स्थिर कर सामने रखे कागज पर पेन्सिल से चित्र को हू-ब-हू उतारने लगे। कुछ ही मिनटों में उनकी माँ का रेखाचित्र तैयार हो गया। निर्विकार महोदय बहुत प्रसन्न हुये अपनी माँ के रेखाचित्र बन पाने से निर्विकार महोदय अति प्रसन्न हो गए। वे उस सन्यासी की कुछ सेवा करना चाहते थे पर उस साधक ने किसी सेवा को स्वीकार नहीं किया।

      अघोरी सन्यासियों द्वारा अपने मल-मूत्र को इच्छानुसार खाद्य या पेय पदार्थ के रूप में परिवर्तन कर देना कम आश्चर्य की बात नहीं है। एक अंग्रेज अघोरी सन्यासी था। वह द्वितीय विश्वयुद्ध के समय फ़ौज में उच्च पदाधिकारी था। एक बार घमासान युद्ध हो रहा था। उनके तरफ के बहुत सारे जवान मारे गए थे। स्वयं वह भी घायल होकर युद्धभूमि में बेहोश पड़ा था--दो दिन, दो रातों तक। बेहोशी टूटने पर उसने देखा--चारों ओर गहरी निस्तब्धता छाई हुई थी। चारों ओर बिखरी लाशें ही लाशें, उनके बीच में पड़ा वह अकेला। किसी तरह वह उठकर बैठा तो देखता क्या है कि एक लम्बी औरत जिसके शरीर का रंग बिलकुल काला था, बाल बिखरे हुए थे और बिलकुल नग्न थी, अपने हाथ में एक बड़ा-सा खड्ग लिए हुए थी। बड़े ही इत्मीनान से लाशों के बीच में घूम घूम कर उनके चेहरों की ओर देख रही थी। कभी किसी लाश को उठाकर खड्ग से उसकी गर्दन काट देती और मुण्ड को अपनी झोली में रख लेती। बड़ा ही भयंकर और आश्चर्यजनक दृश्य था। पहले तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ। सोचा--सब भ्रम है। वह ऑंखें मल-मल कर उसे बार-बार देखता। सहसा वह लाशों को कुचलती हुई पास आ गयी और उसे गौर से देखने लगी। भय से रोमांचित हो उठा वह। उस औरत की लाल अंगारों सी दहकती ऑंखें उस अन्धकार में भी चमक रहीं थीं। सहसा एक अट्टहास गूंज उठा वहां और वह औरत बाल पकड़कर उसे दूर तक खींचती हुई ले गयी और फिर उसी स्थिति में वह बेहोश हो गया। 

      इस बार जब उस अंग्रेज फौजी अफसर की बेहोशी टूटी तो उसने अपने आपको हज़ारों मील दूर हिमालय की एक गुफा में पाया। वह गुफा एक अघोरी साधू की थी। कुछ दिन वह उसी गुफा में रहा, फिर वाराणसी चला आया। उसके जीवन में अचानक परिवर्तन हो गया। वह स्वयं उस परिवर्तन को नहीं समझ पाता था। वह इस प्रश्न के उत्तर को भी न पा सका कि हज़ारों मील दूर हिमालय की उस गुफा में वह कैसे पहुँच गया था। एक विचित्र और अविश्वसनीय घटना थी जिसने उसे फौजी अफसर से एक अघोरी सन्यासी बना दिया। इतना ही नहीं, उसमें अलौकिक शक्ति भी भर दी थी। वह अपने  मल-मूत्र को इच्छित खाद्य पदार्थों में परिवर्तन कर दिया करता था। फलों को हवा में हाथ हिलाकर प्राप्त कर लेना तो उसके लिए वहुत ही सरल था।

      एकबार मूसलाधार वर्षा हो रही थी। श्मशान में लगी एक चिता वर्षा के कारण जल नहीं पा रही थी। पहले आजकल की तरह छाया वाले शवदाह-ग्रह नहीं होते थे। वह सन्यासी अपने स्थान से उठा और जाकर चिता पर पेशाब करने लगा। लोगों ने तत्काल तीव्र विरोध किया, तबतक वह पेशाब कर चुका था। लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उन्होंने देखा कि जो चिता जल नहीं पा रही थी, अब धू-धू कर जलना शुरू हो गयी। ऐसा लगा कि घड़ों घी पड़ गया चिता में। वर्षा के बावजूद चिता से लम्बी लम्बी लपटें निकल रहीं थीं।

       एक बार उस सन्यासी ने मुझे (पूज्य गुरुदेव को) श्मशान में पडा गुलाब का एक ताज़ा खिला हुआ फूल दिया और बोला--रख लो अपने पास। वर्षों तक वह फूल मेरी अलमारी में पड़ा रहा परन्तु न वह मुरझाया और न ही वह म्लान हुआ। बराबर खिला रहा और महकता रहा।

      यह सब चमत्कार आप कैसे करते हैं ?

      यह पूछने पर उसने मुझे (गुरुदेव को) बतलाया कि इस सम्बन्ध में वह कुछ जानते-समझते नहीं। वह केवल सोचते भर हैं कि ऐसा होना चाहिए और वह हो जाता है। इसके पीछे क्या रहस्य है ?--उसको पता नहीं।

       साधारण मनुष्य में इच्छा तो होती है पर उसमें शक्ति नहीं होती। एक इच्छा को पूर्ण करने के लिए शारीरिक, मानसिक, व्यावहारिक, क्रियात्मक--सभी प्रकार की शक्तियों का प्रयोग करना पड़ता है, तब कहीं जाकर इच्छा पूर्ण होती है। मगर योगियों में ये सारी शक्तियाँ उनकी इच्छा के साथ-साथ उत्पन्न हो जाती हैं जिसके फलस्वरूप तत्काल इच्छानुसार परिणाम सामने आ जाता है।

      इच्छा और उसकी शक्ति दो अलग-अलग वस्तुएं हैं। दोनों को जोड़ती हैं अल्फ़ा और बीटा तरंगें। किसी काम की इच्छा होती है। इच्छा के साथ-ही-साथ मन में बीटा तरंगे उत्पन्न होने लगती हैं। यदि उसी समय अल्फ़ा तरंगें प्रवाहित होने लग जाएँ तो बीटा तरंगें उसमें घुल-मिल कर वे शक्तियां उत्पन्न करने लग जाती हैं जिनके द्वारा इच्छा क्रियान्वित और साकार होना शुरू हो जाती। यही रहस्य होता है अघोरियों, साधू-सन्यासियों, तांत्रिकों और योगियों के द्वारा किये गए चमत्कारों के पीछे जो उनके लिए साधारण सी बात है। यही चमत्कार है-यही सिद्धि हैं। साभार पुजारी मनीष भारद्वाज Facebook 

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बुधवार, 6 मई 2026

मन की सुक्ष्म गतिविधियां

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 1. मन: आत्मा का प्रतिबिंब (सूक्ष्म स्वरूप)

​तात्विक दृष्टि से मन आत्मा का ही प्रतिबिंब है। यहाँ जब हम चेतना की बात करते हैं, तो इसका वह हिस्सा अतिसूक्ष्म है। इस अवस्था में मन अपनी व्यापकता में सम्पूर्ण ब्रह्मांड के स्वरूप को समाहित किए रहता है। यह चेतना का वह शुद्ध रूप है जहाँ कोई सीमा नहीं है।

2. मन: जीव का प्रतिबिंब (पिंड स्वरूप)

​इसके विपरीत, जब मन अपनी मूल चेतना (आत्मा) से विमुख हो जाता है, तब वह केवल 'जीव' का प्रतिबिंब बनकर रह जाता है। इस अवस्था में वह विराट ब्रह्मांडीय स्वरूप को त्यागकर 'पिंड' (सीमित शरीर) के स्वरूप में सिमट जाता है।

3. यथार्थ से विस्मृति और भौतिक आसक्ति

​जब चेतना अनंत विषयों को धारण कर लेती है, तब वह अपने वास्तविक और यथार्थ स्वरूप से भटक जाती है। इस प्रक्रिया में:


• वह अपनी सूक्ष्म सत्ता का त्याग कर देती है।


• वह केवल शरीरी सत्ता (भौतिक अस्तित्व) को ही एकमात्र सत्य मान लेती है।


• परिणामस्वरूप, चेतना स्वयं का अस्तित्व भूलकर केवल भौतिक शरीर का प्रतिबिंब बन जाती है।

4. इंद्रियों के अधीन जीवन

​अन्ततः, अपने वास्तविक स्वरूप से दूर होकर यह जीव केवल इंद्रियों की इच्छाओं की पूर्ति को ही अपना चरम लक्ष्य मान लेता है। पूरा जीवन केवल भौतिक सुखों और मानसिक वृत्तियों के जाल में उलझकर व्यतीत हो जाता है, जहाँ यथार्थ की पहचान ओझल रहती है।

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शुक्रवार, 1 मई 2026

राजयोग (Raja Yoga) का अर्थ है "योगों का राजा"

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 राजयोग (Raja Yoga) का अर्थ है "योगों का राजा"


। यह महर्षि पतंजलि द्वारा बताए गए 'अष्टांग योग' का ही एक रूप है, जिसका मुख्य लक्ष्य मन पर पूर्ण विजय प्राप्त करना और आत्म-साक्षात्कार (Self-realization) है।

​जहाँ अन्य योग शरीर या श्वास पर ध्यान केंद्रित करते हैं, राजयोग सीधे चित्त (मन) की वृत्तियों को रोकने पर बल देता है।

​राजयोग के आठ अंग (अष्टांग योग)

​पतंजलि के अनुसार राजयोग की प्राप्ति के लिए इन आठ चरणों का पालन किया जाता है:

​यम: नैतिक अनुशासन (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह)।

​नियम: व्यक्तिगत अनुशासन (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान)।

​आसन: शरीर को स्थिर और सुखदायक अवस्था में रखना।

​प्राणायाम: श्वास की गति पर नियंत्रण।

​प्रत्याहार: इंद्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर अंतर्मुखी करना।

​धारणा: मन को किसी एक विचार या बिंदु पर केंद्रित करना।

​ध्यान: उस केंद्र बिंदु पर निरंतर एकाग्रता।

​समाधि: वह अवस्था जहाँ साधक और ईश्वर (या परम तत्व) एक हो जाते हैं।

​राजयोग के मुख्य लाभ

​मानसिक शांति: यह तनाव और चिंता को कम कर मन को शांत और स्थिर बनाता है।

​इच्छाशक्ति में वृद्धि: मन पर नियंत्रण होने से संकल्प शक्ति (Willpower) बढ़ती है।

​एकाग्रता: काम और पढ़ाई में फोकस बेहतर होता है।

​भावनात्मक संतुलन: परिस्थितियों के प्रति प्रतिक्रिया देने के बजाय व्यक्ति शांत रहकर निर्णय लेना सीखता है।


​एक सरल सूत्र: राजयोग का अर्थ केवल आंखें बंद करके बैठना नहीं है, बल्कि जीवन की हर परिस्थिति में अपने मन का मालिक (राजा) बने रहना है।

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गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

जनेऊ पहनते के क्या है लाभ, और क्यों पहनते हैं

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 जनेऊ पहनते के क्या है लाभ, और क्यों पहनते हैं


ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम अर्थात ब्राह्मण ब्रह्म ,ईश्वर, तेज से युक्‍त हो।

ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, प्रजापतेयर्त्सहजं पुरस्तात्।

आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं, यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥

जनेऊ को उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध, मोनीबन्ध और ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। इसे उपनयन संस्कार भी कहते हैं। उपनयन' का अर्थ है, 'पास या सन्निकट ले जाना।' किसके पास? ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना। हिन्दू समाज का हर वर्ग जनेऊ धारण कर सकता है। जनेऊ धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ होता है दूसरा जन्म। कालांतर में इस संस्कार को दूसरे धर्मों में धर्मांतरित करने के लिए उपयोग किया जाने लगा। हिन्दू धर्म में प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है जनेऊ पहनना और उसके नियमों का पालन करना। हर हिन्दू जनेऊ पहन सकता है बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे।

क्यों पहनते हैं जनेऊ : हिन्दू धर्म के 24 संस्कारों में से एक 'उपनयन संस्कार' के अंतर्गत ही जनेऊ पहनी जाती है जिसे यज्ञोपवीत संस्कार' भी कहा जाता है। मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते हैं। प्राचीनकाल में पहले शिष्य, संत और ब्राह्मण बनाने के लिए दीक्षा दी जाती थी। इस दीक्षा देने के तरीके में से एक जनेऊ धारण करना भी होता था। प्राचीनकाल में गुरुकुल में दीक्षा लेने या संन्यस्त होने के पूर्व यह संकार होता था।

यज्ञोपवीत को व्रतबन्ध भी कहते हैं। व्रतों से बंधे बिना मनुष्य का उत्थान सम्भव नहीं। यज्ञोपवीत को व्रतशीलता का प्रतीक मानते हैं। इसीलिए इसे सूत्र (फार्मूला, सहारा) भी कहते हैं। धर्म शास्त्रों में यम-नियम को व्रत माना गया है। बालक की आयुवृद्धि हेतु गायत्री तथा वेदपाठ का अधिकारी बनने के लिए उपनयन (जनेऊ) संस्कार अत्यन्त आवश्यक है।

दीक्षा देना : दीक्षा देने का प्रचलन वैदिक ऋषियों ने प्रारंभ किया था। प्राचीनकाल में पहले शिष्य और ब्राह्मण बनाने के लिए दीक्षा दी जाती थी। माता-पिता अपने बच्चों को जब शिक्षा के लिए भेजते थे तब भी दीक्षा दी जाती थी। हिन्दू धर्मानुसार दिशाहीन जीवन को दिशा देना ही दीक्षा है। दीक्षा एक शपथ, एक अनुबंध और एक संकल्प है। दीक्षा के बाद व्यक्ति द्विज बन जाता है। द्विज का अर्थ दूसरा जन्म। दूसरा व्यक्तित्व।

अन्य धर्मों में यह संस्कार : हिन्दू धर्म से प्रेरित यह उपनयन संस्कार सभी धर्मों में मिल जाएगा। यह दीक्षा देने की परंपरा प्राचीनकाल से रही है, हालांकि कालांतर में दूसरे धर्मों में दीक्षा को अपने धर्म में धर्मांतरित करने के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा। इस आर्य संस्कार को सभी धर्मों में किसी न किसी कारणवश भिन्न-भिन्न रूप में अपनाया जाता रहा है। मक्का में काबा की परिक्रमा से पूर्व यह संस्कार किया जाता है।

सारनाथ की अति प्राचीन बुद्ध की प्रतिमा का सूक्ष्म निरीक्षण करने से उसकी छाती पर यज्ञोपवीत की सूक्ष्म रेखा दिखाई देती है। जैन धर्म में भी इस संस्कार को किया जाता है। वित्र मेखला अधोवसन (लुंगी) का सम्बन्ध पारसियों से भी है। सिख धर्म में इसे अमृत संचार कहते हैं। बौद्ध धर्म से इस परंपरा को ईसाई धर्म ने अपनाया जिसे वे बपस्तिमा कहते हैं। यहूदी और इस्लाम धर्म में खतना करके दीक्षा दी जाती है।

जनेऊ पहनने के 9 लाभ

जनेऊ को हर उस हिन्दू को धारण करना चाहिए जो मांस और शराब को छोड़कर सादगीपूर्ण जीवन यापन करना चाहता है। हम यहां जनेऊ पहनने के आपको लाभ बता रहे हैं। जनेऊ के नियमों का पालन करके आप निरोगी जीवन जी सकते हैं।

1.जीवाणुओं-कीटाणुओं से बचाव : जो लोग जनेऊ पहनते हैं और इससे जुड़े नियमों का पालन करते हैं, वे मल-मूत्र त्याग करते वक्त अपना मुंह बंद रखते हैं। इसकी आदत पड़ जाने के बाद लोग बड़ी आसानी से गंदे स्थानों पर पाए जाने वाले जीवाणुओं और कीटाणुओं के प्रकोप से बच जाते हैं।

2.गुर्दे की सुरक्षा : यह नियम है कि बैठकर ही जलपान करना चाहिए अर्थात खड़े रहकर पानी नहीं पीना चाहिए। इसी नियम के तहत बैठकर ही मूत्र त्याग करना चाहिए। उक्त दोनों नियमों का पालन करने से किडनी पर प्रेशर नहीं पड़ता। जनेऊ धारण करने से यह दोनों ही नियम अनिवार्य हो जाते हैं।

3.हृदय रोग व ब्लडप्रेशर से बचाव : शोधानुसार मेडिकल साइंस ने भी यह पाया है कि जनेऊ पहनने वालों को हृदय रोग और ब्लडप्रेशर की आशंका अन्य लोगों के मुकाबले कम होती है। जनेऊ शरीर में खून के प्रवाह को भी कंट्रोल करने में मददगार होता है। ‍चिकित्सकों अनुसार यह जनेऊ के हृदय के पास से गुजरने से यह हृदय रोग की संभावना को कम करता है, क्योंकि इससे रक्त संचार सुचारू रूप से संचालित होने लगता है।

4.लकवे से बचाव : जनेऊ धारण करने वाला आदमी को लकवे मारने की संभावना कम हो जाती है क्योंकि आदमी को बताया गया है कि जनेऊ धारण करने वाले को लघुशंका करते समय दांत पर दांत बैठा कर रहना चाहिए। मल मूत्र त्याग करते समय दांत पर दांत बैठाकर रहने से आदमी को लकवा नहीं मारता।

5.कब्ज से बचाव : जनेऊ को कान के ऊपर कसकर लपेटने का नियम है। ऐसा करने से कान के पास से गुजरने वाली उन नसों पर भी दबाव पड़ता है, जिनका संबंध सीधे आंतों से है। इन नसों पर दबाव पड़ने से कब्ज की श‍िकायत नहीं होती है। पेट साफ होने पर शरीर और मन, दोनों ही सेहतमंद रहते हैं।

6.शुक्राणुओं की रक्षा : दाएं कान के पास से वे नसें भी गुजरती हैं, जिसका संबंध अंडकोष और गुप्तेंद्रियों से होता है। मूत्र त्याग के वक्त दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से वे नसें दब जाती हैं, जिनसे वीर्य निकलता है। ऐसे में जाने-अनजाने शुक्राणुओं की रक्षा होती है। इससे इंसान के बल और तेज में वृद्ध‍ि होती है।

7.स्मरण शक्ति‍ की रक्षा : कान पर हर रोज जनेऊ रखने और कसने से स्मरण शक्त‍ि का क्षय नहीं होता है। इससे स्मृति कोष बढ़ता रहता है। कान पर दबाव पड़ने से दिमाग की वे नसें एक्ट‍िव हो जाती हैं, जिनका संबंध स्मरण शक्त‍ि से होता है। दरअसल, गलतियां करने पर बच्चों के कान पकड़ने या ऐंठने के पीछे भी मूल कारण यही होता था।

8.आचरण की शुद्धता से बढ़ता मानसिक बल : कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य बुरे कार्यों से दूर रहने लगता है। पवित्रता का अहसास होने से आचरण शुद्ध होने लगते हैं। आचरण की शुद्धत से मानसिक बल बढ़ता है।

9.बुरी आत्माओं से रक्षा : ऐसी मान्यता है कि जनेऊ पहनने वालों के पास बुरी आत्माएं नहीं फटकती हैं। इसका कारण यह है कि जनेऊ धारण करने वाला खुद पवित्र आत्मरूप बन जाता है और उसमें स्वत: ही आध्यात्म‍िक ऊर्जा का विकास होता है।

अलगे पन्ने पर कान में ही क्यों लपेटते हैं जनेऊ

क्यों कान पर लपेटते हैं जनेऊं : मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर दो बार लपेटना पड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसें, जिनका संबंध पेट की आंतों से होता है, आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है, जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है तथा कान के पास ही एक नस से मल-मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उसके वेग को रोक देती है, जिससे कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय के रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते।

कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है। कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है। जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति नियमों में बंधा होता है। वह मल विसर्जन के पश्चात अपनी जनेऊ उतार नहीं सकता। जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले। अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही जनेऊ कान से उतारता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जीवाणुओं के रोगों से बचाती है। इसी कारण जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को होता है।

चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है। वैज्ञानिकों अनुसार बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से इस समस्या से मुक्ति मिल जाती है।

माना जाता है कि शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह काम करती है। यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कमर तक स्थित है। जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह नियंत्रित रहता है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है।

विद्यालयों में बच्चों के कान खींचने के मूल में एक यह भी तथ्य छिपा हुआ है कि उससे कान की वह नस दबती है, जिससे मस्तिष्क की कोई सोई हुई तंद्रा कार्य करती है। इसलिए भी यज्ञोपवीत को दायें कान पर धारण करने का उद्देश्य बताया गया है।

जनेऊ का धार्मिक महत्व : यज्ञोपवीत को व्रतबन्ध कहते हैं। व्रतों से बंधे बिना मनुष्य का उत्थान सम्भव नहीं। यज्ञोपवीत को व्रतशीलता का प्रतीक मानते हैं। इसीलिए इसे सूत्र (फार्मूला, सहारा) भी कहते हैं। धर्म शास्त्रों में यम-नियम को व्रत माना गया है। बालक की आयुवृद्धि हेतु गायत्री तथा वेदपाठ का अधिकारी बनने के लिए उपनयन (जनेऊ) संस्कार अत्यन्त आवश्यक है। जनेऊ से पवित्रता का अहसास होता है। यह मन को बुरे कार्यों से बचाती है। कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य बुरे कार्यों से दूर रहने लगता है।

धार्मिक दृष्टि से माना जाता है कि जनेऊ धारण करने से शरीर शुद्घ और पवित्र होता है। शास्त्रों अनुसार आदित्य, वसु, रुद्र, वायु, अग्नि, धर्म, वेद, आप, सोम एवं सूर्य आदि देवताओं का निवास दाएं कान में माना गया है। अत: उसे दाएं हाथ से सिर्फ स्पर्श करने पर भी आचमन का फल प्राप्त होता है। आचमन अर्थात मंदिर आदि में जाने से पूर्व या पूजा करने के पूर्व जल से पवित्र होने की क्रिया को आचमन कहते हैं। इस्लाम धर्म में इसे वजू कहते हैं।

द्विज : स्वार्थ की संकीर्णता से निकलकर परमार्थ की महानता में प्रवेश करने को, पशुता को त्याग कर मनुष्यता ग्रहण करने को दूसरा जन्म कहते हैं। शरीर जन्म माता-पिता के रज-वीर्य से वैसा ही होता है, जैसा अन्य जीवों का। आदर्शवादी जीवन लक्ष्य अपना लेने की प्रतिज्ञा करना ही वास्तविक मनुष्य जन्म में प्रवेश करना है। इसी को द्विजत्व कहते हैं। द्विजत्व का अर्थ है दूसरा जन्म।

सामाजिक महत्व : आदमी को दो जनेऊ धारण कराया जाता है। धारण करने के बाद उसे बताता है कि उसे दो लोगों का भार या जिम्मेदारी वहन करना है, एक पत्नी पक्ष का और दूसरा अपने पक्ष का अर्थात् पति पक्ष का। अब एक-एक जनेऊ में 9-9 धागे होते हैं जो हमें बताते हैं कि हम पर पत्नी और पत्नी पक्ष के 9-9 ग्रहों का भार ये ऋण है उसे वहन करना है। अब इन 9-9 धागों के अंदर से 1-1 धागे निकालकर देखें तो इसमें 27-27 धागे होते हैं। अर्थात् हमें पत्नी और पति पक्ष के 27-27 नक्षत्रों का भी भार या ऋण वहन करना है। अब अगर अंक विद्या के आधार पर देंखे तो 27+9 = 36 होता है, जिसको एकल अंक बनाने पर 36= 3+6 = 9 आता है, जो एक पूर्ण अंक है। अब अगर इस 9 में दो जनेऊ की संख्या अर्थात 2 और जोड़ दें तो 9+2= 11 होगा जो हमें बताता है की हमारा जीवन अकेले अकेले दो लोगों अर्थात् पति और पत्नी (1 और 1) के मिलने से बना है। 1+1 = 2 होता है जो अंक विद्या के अनुसार चंद्रमा का अंक है। जब हम अपने दोनों पक्षों का ऋण वहन कर लेते हैं तो हमें अशीम शांति की प्राप्ति हो जाती है।

यज्ञोपवीत धारण करने के नियम

यज्ञोपवीत धारण करने वाले व्यक्ति को सभी नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। एक बार जनेऊ धारण करने के बाद मनुष्य इसे उतार नहीं सकता। मैला होने पर उतारने के बाद तुरंत ही दूसरा जनेऊ धारण करना पड़ता है।

लड़की भी पहन सकती है जनेऊ : वह लड़की जिसे आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करना हो, वह जनेऊ धारण कर सकती है। ब्रह्मचारी तीन और विवाहित छह धागों की जनेऊ पहनता है। यज्ञोपवीत के छह धागों में से तीन धागे स्वयं के और तीन धागे पत्नी के बतलाए गए हैं।

कब पहने जनेऊ : जिस दिन गर्भ धारण किया हो उसके आठवें वर्ष में बालक का उपनयन संस्कार किया जाता है। जनेऊ पहनने के बाद ही विद्यारंभ होता है, लेकिन आजकल गुरु परंपरा के समाप्त होने के बाद अधिकतर लोग जनेऊ नहीं पहनते हैं तो उनको विवाह के पूर्व जनेऊ पहनाई जाती है। लेकिन वह सिर्फ रस्म अदायिगी से ज्यादा कुछ नहीं, क्योंकि वे जनेऊ का महत्व नहीं समझते हैं।

यथा-निवीनी दक्षिण कर्णे यज्ञोपवीतं कृत्वा मूत्रपुरीषे विसृजेत।।

अर्थात : अशौच एवं मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ रखना आवश्यक है। हाथ पैर धोकर और कुल्ला करके ही इसे उतारें।

किसी भी धार्मिक कार्य, पूजा-पाठ, यज्ञ आदि करने के पूर्व जनेऊ धारण करना जरूरी है।

विवाह तब तक नहीं होता जब तक की जनेऊ धारण नहीं किया जाता है।

जब भी मूत्र या शौच विसर्जन करते वक्त जनेऊ धारण किया जाता है।

यज्ञोपवीत को मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका स्थूल भाव यह है कि यज्ञोपवीत कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। अपने व्रतशीलता के संकल्प का ध्यान इसी बहाने बार-बार किया जाए।

यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए। खंडित प्रतिमा शरीर पर नहीं रखते। धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो पहले ही बदल देना उचित है।

जन्म-मरण के सूतक के बाद इसे बदल देने की परम्परा है। जिनके गोद में छोटे बच्चे नहीं हैं, वे महिलाएं भी यज्ञोपवीत संभाल सकती हैं; किन्तु उन्हें हर मास मासिक शौच के बाद उसे बदल देना पड़ता है।

यज्ञोपवीत शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित की एक माला जप करने या बदल लेने का नियम है।

देव प्रतिमा की मर्यादा बनाये रखने के लिए उसमें चाबी के गुच्छे आदि न बांधें। इसके लिए भिन्न व्यवस्था रखें। बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाएं, तभी उनका यज्ञोपवीत करना चाहिए।

अंत में जानिए आखिर जनेऊ क्या है, कैसे बनती और धारण करते हैं

जनेऊ क्या है : आपने देखा होगा कि बहुत से लोग बाएं कांधे से दाएं बाजू की ओर एक कच्चा धागा लपेटे रहते हैं। इस धागे को जनेऊ कहते हैं। जनेऊ तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। अर्थात इसे गले में इस तरह डाला जाता है कि वह बाएं कंधे के ऊपर रहे।

तीन सूत्र क्यों : जनेऊ में मुख्‍यरूप से तीन धागे होते हैं। प्रथम यह तीन सूत्र त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं। द्वितीय यह तीन सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं और तृतीय यह सत्व, रज और तम का प्रतीक है। चतुर्थ यह गायत्री मंत्र के तीन चरणों का प्रतीक है। पंचम यह तीन आश्रमों का प्रतीक है। संन्यास आश्रम में यज्ञोपवीत को उतार दिया जाता है।

नौ तार : यज्ञोपवीत के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। इस तरह कुल तारों की संख्‍या नौ होती है। एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वारा मिलाकर कुल नौ होते हैं। हम मुख से अच्छा बोले और खाएं, आंखों से अच्छा देंखे और कानों से अच्छा सुने।

पांच गांठ : यज्ञोपवीत में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्ध, काम और मोक्ष का प्रतीक है। यह पांच यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों का भी प्रतीक भी है।

जनेऊ की लंबाई : यज्ञोपवीत की लंबाई 96 अंगुल होती है। इसका अभिप्राय यह है कि जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए। चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक मिलाकर कुल 32 विद्याएं होती है। 64 कलाओं में जैसे- वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि।

जनेऊ धारण वस्त्र : जनेऊ धारण करते वक्त बालक के हाथ में एक दंड होता है। वह बगैर सिला एक ही वस्त्र पहनता है। गले में पीले रंग का दुपट्टा होता है। मुंडन करके उसके शिखा रखी जाती है। पैर में खड़ाऊ होती है। मेखला और कोपीन पहनी जाती है।

मेखला, कोपीन, दंड : मेखला और कोपीन संयुक्त रूप से दी जाती है। कमर में बांधने योग्य नाड़े जैसे सूत्र को मेखला कहते हैं। मेखला को मुंज और करधनी भी कहते हैं। कपड़े की सिली हुई सूत की डोरी, कलावे के लम्बे टुकड़े से मेखला बनती है। कोपीन लगभग 4 इंच चौड़ी डेढ़ फुट लम्बी लंगोटी होती है। इसे मेखला के साथ टांक कर भी रखा जा सकता है। दंड के लिए लाठी या ब्रह्म दंड जैसा रोल भी रखा जा सकता है। यज्ञोपवीत को पीले रंग में रंगकर रखा जाता है।

जनेऊ धारण : बगैर सिले वस्त्र पहनकर, हाथ में एक दंड लेकर, कोपीन और पीला दुपट्टा पहनकर विधि-विधान से जनेऊ धारण की जाती है। जनेऊ धारण करने के लिए एक यज्ञ होता है, जिसमें जनेऊ धारण करने वाला लड़का अपने संपूर्ण परिवार के साथ भाग लेता है। यज्ञ द्वारा संस्कार किए गए विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्थित करके बनाया जाता है। तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है। अपवित्र होने पर यज्ञोपवीत बदल लिया जाता है।

गायत्री मंत्र : यज्ञोपवीत गायत्री मंत्र से शुरू होता है। गायत्री- उपवीत का सम्मिलन ही द्विजत्व है। यज्ञोपवीत में तीन तार हैं, गायत्री में तीन चरण हैं। ‘तत्सवितुर्वरेण्यं’ प्रथम चरण, ‘भर्गोदेवस्य धीमहि’ द्वितीय चरण, ‘धियो यो न: प्रचोदयात्’ तृतीय चरण है। गायत्री महामंत्र की प्रतिमा- यज्ञोपवीत, जिसमें 9 शब्द, तीन चरण, सहित तीन व्याहृतियां समाहित हैं।

यज्ञोपवीत धारण करने का मन्त्र

यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् ।

आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।

ऐसे करते हैं संस्कार : यज्ञोपवित संस्कार प्रारम्भ करने के पूर्व बालक का मुंडन करवाया जाता है। उपनयन संस्कार के मुहूर्त के दिन लड़के को स्नान करवाकर उसके सिर और शरीर पर चंदन केसर का लेप करते हैं और जनेऊ पहनाकर ब्रह्मचारी बनाते हैं। फिर होम करते हैं। फिर विधिपूर्वक गणेशादि देवताओं का पूजन, यज्ञवेदी एवं बालक को अधोवस्त्र के साथ माला पहनाकर बैठाया जाता है। फिर दस बार गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित करके देवताओं के आह्‍वान के साथ उससे शास्त्र शिक्षा और व्रतों के पालन का वचन लिया जाता है।

फिर उसकी उम्र के बच्चों के साथ बैठाकर चूरमा खिलाते हैं फिर स्नान कराकर उस वक्त गुरु, पिता या बड़ा भाई गायत्री मंत्र सुनाकर कहता है कि आज से तू अब ब्राह्मण हुआ अर्थात ब्रह्म ,,सिर्फ ईश्वर को मानने वाला,, को माने वाला हुआ।

इसके बाद मृगचर्म ओढ़कर मुंज (मेखला) का कंदोरा बांधते हैं और एक दंड हाथ में दे देते हैं। तत्पश्चात्‌ वह बालक उपस्थित लोगों से भीक्षा मांगता है। शाम को खाना खाने के पश्चात्‌ दंड को साथ कंधे पर रखकर घर से भागता है और कहता है कि मैं पढ़ने के लिए काशी जाता हूं। बाद में कुछ लोग शादी का लालच देकर पकड़ लाते हैं। तत्पश्चात वह लड़का ब्राह्मण मान लिया जाता है।

जनेऊ संस्कार का समय : माघ से लेकर छ: मास उपनयन के लिए उपयुक्त हैं। प्रथम, चौथी, सातवीं, आठवीं, नवीं, तेरहवीं, चौदहवीं, पूर्णमासी एवं अमावस की तिथियां बहुधा छोड़ दी जाती हैं। सप्ताह में बुध, बृहस्पति एवं शुक्र सर्वोत्तम दिन हैं, रविवार मध्यम तथा सोमवार बहुत कम योग्य है। किन्तु मंगल एवं शनिवार निषिद्ध माने जाते हैं।

मुहूर्त : नक्षत्रों में हस्त, चित्रा, स्वाति, पुष्य, घनिष्ठा, अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, श्रवण एवं रवती अच्छे माने जाते हैं। एक नियम यह है कि भरणी, कृत्तिका, मघा, विशाखा, ज्येष्ठा, शततारका को छोड़कर सभी अन्य नक्षत्र सबके लिए अच्छे हैं।

पुनश्च: : पूर्वाषाढ, अश्विनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, ज्येष्ठा, पूर्वाफाल्गुनी, मृगशिरा, पुष्य, रेवती और तीनों उत्तरा नक्षत्र द्वितीया, तृतीया, पंचमी, दसमी, एकादसी, तथा द्वादसी तिथियां, रवि, शुक्र, गुरु और सोमवार दिन, शुक्ल पक्ष, सिंह, धनु, वृष, कन्या और मिथुन राशियां उत्तरायण में सूर्य के समय में उपनयन यानी यज्ञोपवीत यानी जनेऊ संस्कार शुभ होता है।

जनेऊ धारण के नियम

मल-मूत्र विसर्जन के दौरान जनेऊ को दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका मूल भाव यह है कि जनेऊ कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। यह बेहद जरूरी होता है।

अगर जनेऊ का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए। खंडित प्रतिमा शरीर पर नहीं रखते। धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो पहले ही बदल देना उचित है।

घर में जन्म-मरण के सूतक के बाद इसे बदल देने की परम्परा है। जिनके गोद में छोटे बच्चे नहीं हैं, वे महिलाएं भी जनेऊ संभाल सकती हैं; किन्तु उन्हें हर मास मासिक शौच के बाद उसे बदल देना पड़ता है।

जनेऊ शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित की एक माला जप करने या बदल लेने का नियम है।

बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाएं, तभी उनका यज्ञोपवीत संस्कार करना चाहिए।

जनेऊ का वैज्ञानिक महत्व

1. बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से ऐसे स्वप्न नहीं आते।

जनेऊ के हृदय के पास से गुजरने से यह हृदय रोग की संभावना को कम करता है, क्योंकि इससे रक्त संचार सुचारू रूप से संचालित होने लगता है।

जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति सफाई नियमों में बंधा होता है। वयह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जीवाणुओं के रोगों से बचाती है।

4. जनेऊ को दायें कान पर धारण करने से कान की वह नस दबती है, जिससे मस्तिष्क की कोई सोई हुई तंद्रा कार्य करती है।

दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है।

कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है।

कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है।

जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह रेखा नियंत्रित रहती है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है।🌹🌹🌹 जय श्री राम🌹🌹🌹


                   🙏 हे महादेव ॥🙏

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कामवासना (Sexual energy) को भारतीय दर्शन और मनोविज्ञान में एक अत्यंत शक्तिशाली ऊर्जा

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 कामवासना (Sexual energy) को भारतीय दर्शन और मनोविज्ञान में एक अत्यंत शक्तिशाली ऊर्जा


माना गया है। सात्विक दृष्टिकोण का अर्थ है—शुद्धता, संतुलन और ऊर्ध्वगमन (ऊपर की ओर उठाना)। काम का सात्विक उपयोग इसे केवल शारीरिक भोग से हटाकर सृजन और आध्यात्मिक उन्नति की ओर मोड़ने की प्रक्रिया है।

​इसके मुख्य सात्विक उपयोग निम्नलिखित हैं:

​1. सृष्टि का सृजन और निरंतरता

​सात्विक दृष्टि में कामवासना का प्राथमिक उद्देश्य उत्तम संतान की उत्पत्ति है। इसे एक "यज्ञ" की तरह देखा जाता है, जहाँ संभोग का उद्देश्य केवल इंद्रिय सुख न होकर, समाज को एक सजग और संस्कारी नई पीढ़ी देना होता है।

​2. प्रेम और आत्मीयता की प्रगाढ़ता

​जब कामवासना में स्वार्थ या केवल शरीर का आकर्षण नहीं होता, तो वह प्रेम (Love) में बदल जाती है। पति और पत्नी के बीच यह ऊर्जा आपसी विश्वास, मित्रता और मानसिक जुड़ाव को गहरा करने का माध्यम बनती है। यह दो व्यक्तियों के बीच के "अहंकार" को मिटाकर उन्हें एक-दूसरे के प्रति समर्पित बनाती है।

​3. ओज और मेधा में परिवर्तन (Transmutation)

​योग शास्त्र के अनुसार, काम ऊर्जा को यदि संयमित रखा जाए, तो यह 'ओज' (Body Vitality) और 'मेधा' (Intellectual power) में परिवर्तित हो जाती है।

​ब्रह्मचर्य और संयम: इसका अर्थ पूर्ण दमन नहीं, बल्कि ऊर्जा का समझदारी से उपयोग है।

​यह मानसिक एकाग्रता, साहस और बौद्धिक क्षमता को बढ़ाती है।

​4. कलात्मक और रचनात्मक अभिव्यक्ति

​महान कलाकार, लेखक और विचारक अपनी इस आंतरिक ऊर्जा को सृजनात्मक कार्यों में लगाते हैं। जब व्यक्ति कामवासना को एक कला (जैसे संगीत, लेखन या चित्रकला) का रूप देता है, तो वह सात्विक श्रेणी में आता है क्योंकि वह संसार को सौंदर्य और प्रेरणा प्रदान कर रहा होता है।

​5. आध्यात्मिक उन्नति (Sublimation)

​कामवासना को 'मूलाधार चक्र' की ऊर्जा माना जाता है। साधना के माध्यम से जब इस ऊर्जा को ऊपर की ओर (सहस्रार चक्र की ओर) प्रवाहित किया जाता है, तो यह आत्म-साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करती है। सात्विक उपयोग में व्यक्ति अपनी वासना को 'उपासना' में बदल देता है।

योगदा सन्यासी के प्रवचन से

चित्र नैनो बनाना से साभार डॉ  आनंद दीक्षित Facebook 


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बुधवार, 29 अप्रैल 2026

विद्युतमानस यंत्र एक अत्यंत सूक्ष्म तांत्रिक यंत्र

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 विद्युतमानस यंत्र एक अत्यंत सूक्ष्म तांत्रिक यंत्र


माना जाता है, जिसका संबंध मन, ऊर्जा और विचार तरंगों को नियंत्रित करने से जोड़ा जाता है। “विद्युत” अर्थात ऊर्जा और “मानस” अर्थात मन—इन दोनों के संयोग से यह यंत्र साधक के मानसिक क्षेत्र को स्थिर, तेज और प्रभावशाली बनाने का माध्यम बनता है। तांत्रिक परंपरा में इसे मानसिक विद्युत शक्ति को जाग्रत करने वाला साधन कहा गया है, जो व्यक्ति के विचारों को दिशा देने और आकर्षण शक्ति बढ़ाने में सहायक होता है।


यह यंत्र मुख्यतः मन को केंद्रित करने, ध्यान में स्थिरता लाने, संकल्प शक्ति बढ़ाने और सूक्ष्म अनुभूति को जाग्रत करने के लिए उपयोग किया जाता है। कुछ साधनाओं में इसे वशीकरण, आकर्षण और संवाद शक्ति को प्रबल करने के लिए भी प्रयोग किया जाता है, क्योंकि यह विचार तरंगों को प्रभावी बनाने की क्षमता से जोड़ा जाता है। जो व्यक्ति लगातार मानसिक अशांति, भ्रम या निर्णय लेने में कमजोरी अनुभव करता है, उसके लिए यह यंत्र सहायक माना जाता है।


इसके लाभों की बात करें तो यह मन को स्थिर करता है, ध्यान में गहराई लाता है, आत्मविश्वास बढ़ाता है और व्यक्ति की आंतरिक ऊर्जा को संतुलित करता है। साधक के भीतर एक प्रकार की तेजस्विता और आकर्षण उत्पन्न होने लगता है, जिससे उसके शब्द और विचार अधिक प्रभावशाली बनते हैं। आध्यात्मिक साधना में यह यंत्र अंतर्ज्ञान को भी जाग्रत करने में सहायक माना गया है।

लेकिन हर शक्ति के साथ सावधानी आवश्यक होती है। यदि इस यंत्र का उपयोग गलत उद्देश्य या असंयमित मन से किया जाए तो मानसिक असंतुलन, अधिक विचारों का दबाव या बेचैनी उत्पन्न हो सकती है। बिना गुरु मार्गदर्शन के गहरी तांत्रिक साधना में इसका प्रयोग करना उचित नहीं माना जाता, क्योंकि यह मन के सूक्ष्म स्तर पर कार्य करता है और गलत प्रयोग से विपरीत परिणाम भी मिल सकते हैं।


यह यंत्र विशेष रूप से उन लोगों के लिए उपयुक्त माना जाता है जो साधना, ध्यान, तंत्र या मनोवैज्ञानिक शक्ति को विकसित करना चाहते हैं। सामान्य व्यक्ति भी इसे रख सकता है, लेकिन केवल शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा के उद्देश्य से ही इसका उपयोग करना चाहिए।


इसे रखने का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। विद्युतमानस यंत्र को घर के पूजा स्थल, ध्यान कक्ष या अध्ययन स्थान में रखा जाना चाहिए, जहाँ शांति और पवित्रता बनी रहे। इसे सीधे जमीन पर नहीं रखना चाहिए, बल्कि लकड़ी या धातु के आसन पर स्थापित करना उचित होता है। साधना के समय इसे अपने सामने रखकर ध्यान करना अधिक प्रभावी माना जाता है।


अंततः यह यंत्र केवल धातु या रेखाओं का बना हुआ एक चित्र नहीं है, बल्कि यह मन की ऊर्जा को दिशा देने वाला एक माध्यम है। सही भावना, संयम और श्रद्धा के साथ इसका उपयोग किया जाए तो यह साधक के जीवन में अद्भुत परिवर्तन ला सकता है, अन्यथा यह केवल एक सामान्य यंत्र बनकर रह जाता है।


नमामीशमीशान 

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